शनिवार, 21 दिसंबर 2013


 


DHOOM 3

 

            Revenge is something that can make a person do anything. A revengeful person can go to an extreme level to take his revenge and never thinks whether the act of his is right or wrong. If his decision is correct or incorrect. Its just a passion and a passionate person never thinks of the end result. He just thinks that he is doing the rigorous act.

 

            Vijay Krishna Acharya’s 3rd version of Dhoom series is about a person Sahir (Aamir Khan). Sahir wants to take revenge from Western Bank Of Chicago. Due to non-payment of debts the bank shut Sahir father’s (Jackie Shroff) ‘The Great Indian Circus’ which caused the death of his father. At that very moment young Sahir decided to take revenge from the bank by destroying it and creating a situation to shut it down. Now the only goal in his life is to take revenge from the bank. This is the time when the game of chase between police and thief begins. Inspector Jai Dikshit (Abhishek Bachchan ofcourse!) follows Sahir like anything. But Sahir is also a very canning and smart thief who can’t be catched so easily as he has a trump card naming Samar. Samar is the suspense of the movie and of Sahir as well. But Jai who is a Super Cop cracks the suspense and catches Sahir!

           

            Vijay Krishna Acharya has written the story of Dhoom and has also written the Screenplay of Dhoom 2, but this time he has taken Director’s seat for Dhoom 3. Alas! He was unable to create the magic of previous Dhoom films. In the first half Aamir was seen running only and the cops keep him chasing, first half was a dud. Second half was gripping but till then it was too late for the viewer. The thing which was omitted in this part of Dhoom is the live burglary which we saw in previous parts. The stunts were also not so impressive. Bad timing of songs, dull story and Pritam’s weak tracks make the movie even more boring. 7 years is a very long gap for viewers to wait. There is nothing so influencing in Dhoom 3 to make it go ‘Dhoom’ again. There was a hope that Aamir will go one step ahead of what Rithik done in the previous version. But Aamir was not even been able to touch Rithik’s benchmark. DoP Sudeep Bhattacharya’s camera work is commendable. The BMW bike which Aamir rode in the movie is a thing one should watch out for.

           

            There is Aamir and only Aamir in the entire movie. Katrina naturally played her part of a glam doll. Playing the role of cops Abhishek Bachchan and Uday Chopra did nothing new. Jackie Shroff done a cameo of Aamir’s father. I don’t know how Mr. Perfectionist Aamir Khan nodded his approval for the movie.

 

            While watching a movie if I yawn even once I get to know that the movie is a big bore. When I watched Dhoom and Dhoom 2 I was glued to my seat, on the other hand when I was watching Dhoom 3 I yawned two times. If you are a big fan of Aamir Khan then this latest version of Dhoom series is only for you or else watch the older ones on Max!

 

 

P.S. : बन्दे हैं हम उसके हमपे किसका ज़ोर, उम्मीदों के सूरज निकले चारों ओर, इरादे हैं फ़ौलादी हिम्मती हर कदम, अपने हाथों किस्मत लिखने आज चले हैं हम..

 
धूम 3

 

धूम 3: बदला..बदला इंसान से कुछ भी करा सकता है..बदला लेने के लिए इंसान कुछ भी कर सकता है..किसी भी हद तक जा सकता है..बदला लेते वक़्त वो ये तक नहीं सोचता कि वो सही कर रहा है या ग़लत..ये बस एक जुनून होता है जो सर पर सवार हो जाए तो बंदा कुछ भी कर गुज़रता है। क्यूँकि बदले की आग होती ही क़ातिल है।

 

      विजय कृष्ण आचार्य की धूम 3 भी बदले की आग में जलने वाले एक शख़्स- साहिर (आमिर ख़ान) की कहानी है। लोन ना चुका पाने के कारण बैंक उसके बाबा (जैकी श्रॉफ़) का दि ग्रेट इंडियन सर्कसबंद कर देता है जो साहिर के बाबा की मौत का कारण बनती है और साहिर के बदले की वजह भी। फिर साहिर बैंक को बर्बाद करके उसे बंद करने की ठान लेता है। बैंक बंद कराना उसकी ज़िंदगी का एक अकेला मक़्सद बन जाता है। फिर शुरू होता है चोर और पुलिस का खेल और इस खेल में इंस्पेक्टर जय दीक्षित (अभिषेक बच्चन) साहिर के पीछे हाथ धो कर पड़ जाता है।  मगर साहिर भी मंझा हुआ खिलाड़ी है क्यूँकि उसके पास एक तुरुप का इक्का है समर। समर ही फ़िल्म का और साहिर का सबसे बड़ा राज़ है, और इसी वजह से जय साहिर को पकड़ने में नाकाम भी होता है। पर जय तो इंडिया का सुपर कॉप है तो वो आख़िरकार साहिर का ये राज़ जान जाता है और उसको पकड़ भी लेता है।

 

      विजय कृष्ण आचार्य ने धूम की कहानी लिखी थी और धूम 2 का स्क्रीनप्ले लिखा था। धूम 3 में कहानी के साथ निर्देशन भी उनका ही है मगर वो धूम सीरीज की पिछली फ़िल्मों की तरह इस फ़िल्म में धूम नहीं मचा पाए। फर्स्ट हाफ़ में तो आमिर सिर्फ भागते हुए ही नज़र आए। इन्टरवल के बाद फ़िल्म थोड़ी ठीक हुई मगर तब तक काफ़ी देर हो चुकी थी। जो बात सबसे ज़्यादा खली वो ये कि फ़िल्म में एक भी चोरी नहीं दिखाई गई जैसा कि दर्शक उम्मीद कर रहे थे। आमिर सिर्फ चोरी करने के बाद भागते हुए ही नज़र आए। फ़िल्म में कुछ ख़ास स्टंट सीन भी नहीं दिखे। गानों की बेकार टाइमिंग, बेदम कहानी और प्रीतम का कमज़ोर संगीत फ़िल्म को और बोरिंग बनाते हैं। 7 साल के लंबे इंतज़ार के बाद आई धूम 3 में धूम मचाने जैसा कुछ भी नहीं था। उम्मीद थी कि आमिर पिछले चोर रितिक से एक कदम आगे जाएंगे पर आमिर रितिक को छू भी नहीं पाए। फ़िल्म में सुदीप भट्टाचार्य का कैमरा शानदार है। बीएमडबल्यू की बाइक जो आमिर ने चलाई है वो फ़िल्म में आकर्षण का केंद्र है।

     

      फ़िल्म में आमिर ही छाए हुए हैं। कटरीना ने फ़िल्म में ग्लैमर का तड़का लगाया है। पुलिस के रोल में अभिषेक बच्चन और उदय चोपड़ा ने कुछ नया नहीं किया है। मिस्टर पर्फ़ेक्शनिस्ट कहे जाने वाले आमिर ख़ान ने कैसे फ़िल्म के लिए हाँ कह दी पता नहीं।

     

      फ़िल्म देखते हुए अगर मुझे जम्हाई आ जाए तो समझ आ जाता है कि फ़िल्म बोरिंग है। धूम और धूम 2 देखते वक़्त मैं सीट से बिना हिले फ़िल्म देखता रहा वहीं धूम 3 देखते हुए मुझे दो बार जम्हाई आई। अगर आप आमिर के बहुत बड़े फैन है तो फ़िल्म आपके लिए ही बनी है वर्ना मैक्स पर धूम की पुरानी फ़िल्में देख लें!

 

P.S. : बन्दे हैं हम उसके हमपे किसका ज़ोर, उम्मीदों के सूरज निकले चारों ओर, इरादे हैं फ़ौलादी हिम्मती हर कदम, अपने हाथों किस्मत लिखने आज चले हैं हम..

सोमवार, 15 जुलाई 2013



भाग मिलखा भाग
वो भागता है..वो दौड़ता है..वो ऐसे दौड़ता है जैसे कि उड़ रहा हो..हवा से बातें कर रहा हो उसको फ़्लाइंग सिक्ख कहते हैं। बचपन में वो स्कूल जाने को दौड़ता है, अपनी जान बचाने के लिये भी दौड़ता है। वो रोटी के लिये दौड़ता है, चोरी करने के लिये दौड़ता है। दूध और अण्डे के लिये दौड़ता है, तो कभी इंडिया का ब्लेज़र पहनने की ख़ातिर दौड़ता है। वो अपनी इज़्जत के लिये दौड़ता है अपने मुल्क के लिये दौड़ता है..और कभी नहीं रुकता सिर्फ़ दौड़ता है।

      जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ फ़्लाइंग सिक्ख मिलखा सिंह की। राकेश ओम प्रकाश मेहरा के मिलखा सिंह की। 1960 के रोम ओलिंपिक्स में मिलखा आख़िर पीछे मुड़ कर क्यो देखते हैं इस रहस्य का पता तो शायद अब तक नहीं चला पर राकेश और फ़िल्म के स्क्रिप्ट राइटर प्रसून जोशी ने इसके पीछे की एक बड़ी ही अटपटी सी कहानी फ़िल्म मे सुनाई है। रोम की इस हार को मिलखा कभी भूलता नहीं और 400 मीटर के वर्ल्ड रिकार्ड को ध्वस्त कर अपनी इज़्ज़त के लिये दौड़ता है। पहले तो वह आर्मी में सिर्फ़ दूध और अण्डे के लिय दौड़ता है मगर बाद में यही दौड़ मिलखा का जुनून बन जाती है। उसकी ताक़त बन जाती है..उसकी पहचान बन जाती है। मिलखा के बचपन से लेकर अथलीट बनने तक के सफ़र को राकेश मेहरा ने प्रसून की कलम की मदद से बख़ूबी परदे पर उतारा है। एक अथलीट जिसे आज बिरले लोग ही जानते हैं उसकी ज़िन्दगी का पन्ना-पन्ना खोल कर रख दिया है राकेश औऱ प्रसून ने। मिलखा रोज़ इतनी मेहनत करते थे कि अपने पसीने से बाल्टी भर देते थे। मगर दूध और अण्डे की ख़ातिर शुरू हुई मिलखा की यह दौड़ बाद में इंडिया का ब्लेज़र और फिर अपने मुल्क की ख़ातिर बदल जाती है। बचपन में अपने बच्चे मिलखा की जान बचाने के लिये उसके पिता उसको भाग मिलखा भाग कहकर भगा देते हैं और तब से मिलखा भागता ही रहता है, कभी रुकता नहीं।

      फ़रहान अख़्तर ने मिलखा के रोल को जैसे जिया है। वो इस तरह मिलखा के रोल में घुसे हैं कि वो जीवंत हो उठता है, लगता है मानो मिलखा सच में हमारे सामने दौड़ रहा है परदे पर नहीं है। राकेश फ़िल्म का निर्देशन करते हुए लगता है थोड़ा भावनाओं में बह गये हैं शायद इसीलिये फ़िल्म की लगाम कसके नहीं पकड़ पाये और फ़िल्म इतनी लंबी हो गयी। स्क्रीनप्ले थोड़ा और अच्छा हो सकता था। इस कहानी को साकार करता और उसमें चार चाँद लगाता है बिनोद प्रधान का कैमरा! जिस तरह से उन्होंने मिलखा की रेस को कैमरे के पीछे से दर्शको तक पहुँचाया है वह देखते ही बनता है।

      मिलखा के कोच की भूमिका में पवन मलहोत्रा और योगराज सिंह दिखे हैं। दोनों ने ही बहुत अच्छी एक्टिंग की है। जहाँ पवन मिलखा में जोश भरकर उसे शुरुआती दिनों में दौड़ना सिखाते हैं वहीं योगराज सिंह (इंडिया के कोच) मिलखा को ट्रेन करते हैं। योगराज की यह पहली फ़िल्म है मगर असल ज़िन्दगी में भी वे ख़ुद एक कोच हैं शायद इसलिये उनको यह रोल करने में ख़ासा परेशानी नहीं हुई। लेकिन परदे पर जब मिलखा की बहन (दिव्या दत्ता) और मिलखा आते हैं वो सीन देखने लायक हैं। मिलखा और उसकी बहन जब भी परदे पर आते हैं छा जाते है। भाई बहन का प्यार उमड़ पड़ता है। दलिप ताहिल (पण्डित नेहरू) और के.के रैना भी बड़े दिनों बाद बड़े परदे पर दिखे हैं। सोनम कपूर मिलखा की प्रेमिका की भूमिका में बहुत ही थोड़ी देर के लिये आई हैं। हवाई जहाज के कैप्टन बन राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने भी फ़िल्म में एक छोटा सा कैमियो किया है। छोटे मिलखा के रोल में जबतेज सिंह ने शानदार अभिनय किया है। ज़िन्दा, हवन करेंगे और लौण्डा इन कुछ गानों को छोड़ दें तो बाकी गाने फ़िल्म में ज़बरदस्ती के हैं और बेदम भी हैं।

      ऐसे अथलीटों पर फ़िल्म ज़रूर बननी चाहिये जो कि इतिहास के पन्नों में कहीं खो गये हैं, पर उन्होंने भारत का नाम ख़ूब रोशन किया है। ध्यानचंद, पी.टी उषा, पान सिंह, मिलखा सिंह ये उन्हीं में से हैं। इन्हें ऐसे इतनी आसानी से भूलना नहीं चाहिये। क्योंकि इन्हें इतनी आसानी से भुलाया नहीं जा सकता। क्योंकि इनमें कुछ कर गुज़रने का माद्दा था जुनून था जो हमेशा हमें प्रेरित करता रहेगा।


P.S.: “सर जी 400 मीटर का वर्ल्ड रिकॉर्ड क्या है ?” ~ मिलखा (फ़रहान अख़्तर) कोच रणवीर सिंह (योगराज सिंह) से

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शुक्रवार, 21 जून 2013

रांझणा
प्यार..ये उपर वाले की बनायी हुई वो नेमत है जो किसी को भी कभी भी, किसी भी उम्र में हो सकता है। कभी ये पहली नज़र में हो जाता है तो कभी इसे समझना बड़ा मुश्किल हो जाता है। कभी इसे समझने में पूरी उम्र लग जाती है। फिर भी हम इसे समझ नहीं पाते। लेकिन अपने दिल को और उस दिल में बसी चाहत को छुपाना या दबाना आसान नहीं होता। सच ये भी है कि इस दिल पर कोई ज़ोर नहीं चलता और प्यार जब होना होता है तब हो जाता है। अपने प्यार की एक झलक, उसकी एक मुस्कान, उसकी हँसी सब कुछ ख़ुद अपने से जान पड़ते हैं और दिल चाहता है कि बस वक़्त यहीं ठहर जाये।

आनंद.एल राय की नयी फ़िल्म रांझणा भी एक ऐसी ही प्रेम कहानी है, जहाँ कुंदन (धनुष) को छुटपन में ही ज़ोया (सोनम कपूर) से पहली ही नज़र में प्यार हो जाता है और वो भी शिद्दत वाला प्यार। ये प्यार बचपन से शुरू होकर जवानी तक रहता है। लड़का भी बनारसी है वो भी पंडित, आसानी से हार मानने वालों में से नहीं है क्योंकि उसे भी पता है कि लड़की इतनी आसानी से मानने वाली नहीं है। सोलह थप्पड़ खाकर लड़की का नाम तो जान लेता है और नस काटकर उससे प्यार का इज़हार भी करवा लेता है। लेकिन फिर लड़की के बाप (कुमुद मिश्रा) कहानी में ट्विस्ट लाते हैं और हर बाप की तरह इन दो प्यार करने वाले किशोरों को जुदा कर देते हैं। जवान होने के बाद ज़ोया किसी और (अभय देओल) को चाहने लगती है। लेकिन कहानी का सबसे बड़ा ट्विस्ट तब आता है जब इस प्यार में राजनीति घुलने लग जाती है। जो कि इस प्रेम कहानी को बड़ा ही भयावह रूप देती है और एक दुखद अंत भी।

हिमांशु शर्मा ने फ़िल्म की एक बड़ी ही अलग तरह की कहानी लिखने की कोशिश की है और फ़िल्म को प्रेम कहानी से लेकर राजनीति तक जोड़ा है। मगर इतनी सारी चीज़ें एक साथ दर्शक शायद पचा ना पायें। लेकिन हिमांशु ने बनारस को ध्यान में रखते हुए फ़िल्म के डायलॉग बड़े ही धाँसू लिखे हैं। जिस वजह से फ़िल्म देखने में मन लगता है।  मसलन साले प्यार ना हुआ यू.पी.एस.सी का इग्ज़ाम हो गया जो दस साल से क्लीयर ही नहीं होता!’,ये बनारस है और अगर लौण्डा साला यहाँ भी हार गया तो जीतेगा कहाँ ?’, आशिक़ की तब नहीं फटती जब उसकी महबूबा की शादी होती है, उसकी तब फटती है जब उसकी शादी होती है। नटराजन सुब्रमण्यम और विशाल सिन्हा की सिनेमैटोग्राफी शानदार है। जिस सहजता से इन्होंने कैमरे के ज़रिये बनारस को परदे पर उतारा है वह देखते ही बनता है।

इंटरवल के पहले तक तो फ़िल्म शानदार है कॉमेडी और रोमांस सबका तड़का भी भरपूर है मगर इंटरवल के बाद फ़िल्म थोड़ी अपनी लय खो देती है मगर वापस फिर से ट्रैक पर आ जाती है। फ़िल्म का संगीत रहमान ने बहुत ख़बसूरत दिया है और गानों की टाइमिंग भी सही है। ख़ासकर फ़िल्म का टाइटल ट्रैक रांझणा, तुम तक, तू मनसुड़ी’, ऐसे ना देखो। सभी गाने अच्छे हैं जो फ़िल्म देखते वक़्त बोर नहीं होने देते।

धनुष ने बहुत ही उम्दा एक्टिंग की है। धनुष की डायलॉग डिलेवरी, उनके एक्सप्रेशन बेहद शानदार हैं। बनारस के लौण्डे के रोल में वो बिल्कुल समा से गये हैं। सोनम की एक्टिंग ठीक-ठाक है जो कि दिल्ली 6 की याद दिलाती है। अभय देओल ने मेहमान कलाकार का अच्छा रोल किया है। सपोर्टिंग रोल में मो. ज़ीशान आयूब ने धनुष के दोस्त मुरारी का दमदार अभिनय किया है। साल के सर्वश्रेस्ठ सह-कलाकार का ख़िताब अगर ज़िशान को मिलता है तो उसमें कोई चौंकने वाली बात नहीं होगी। आनंद.एल राय ने तनु वेड्स मनु की पायल को इस फ़िल्म में भी बिंदिया (स्वारा भास्कर) के तौर पर दोहराया है जो कि यू.पी की लड़की के रोल में बिल्कुल फ़िट बैठती हैं। बड़े दिनों बाद रॉकस्टार के खटारा भाई यानी कुमुद मिश्रा ने भी ज़ोया के अब्बा का अच्छा रोल निभाया है पर उन्हें पहचानना थोड़ा मुश्किल है!

रहमान का संगीत, हिमांशु शर्मा के डायलॉग, धनुष की एक्टिंग और प्यार- ये चार चीज़े इस फ़िल्म में देखने लायक हैं।

P.S: ‘रॉकेट और लड़की किसी को कहीं भी पहुँचा सकते हैं!’ ~ कुंदन (धनुष)

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मंगलवार, 11 जून 2013

ये जवानी है दिवानी
सपने..हर रोज़ हम देखते हैं सपने। कई बार उन सपनों को पूरा करने की कोशिश भी करते हैं हम। कुछ सपने पूरे होते हैं तो बहुतेरे अधूरे रह जाते है। बावजूद इसके हम सपने देखना नहीं छोड़ते। हम कभी ख़ुद के बजाय अपने अपनों के सपने भी पूरे करने की कोशिश में अपनी ज़िन्दगी के अनमोल पल लगा देते हैं। पर अपने सपनों के पीछे भागना और वो भी इतनी शिद्दत से कि उन सपनों को जीने का मौका मिल जाय तो फिर बात ही क्या है!

अयान मुखर्जी की फ़िल्म ये जवानी है दीवानी भी सपनों के पीछे भागते एक शख़्स की कहानी है। बनी उर्फ़ कबीर थापर (रणबीर कपूर) का सपना है कि वह पूरी दुनिया घूम सके और इसके लिये वो कुछ भी करने को तैयार है। क्योंकि उसके लिये उसके सपने ही सबकुछ हैं। अपने सपनों से ज़्यादा उसकी ज़िन्दगी में कुछ भी मायने ही नहीं रखता। वो अपने सपनों को जीना चाहता है और इसकी उसे भारी कीमत भी चुकानी पड़ती है पर फिर भी वो अपने सपनों का पीछा नहीं छोड़ता। मगर उसकी इस दौड़ में खलल तब पड़ती है जब उसे राह में नयना (दीपिका पादुकोण) मिलती है और बनी को उससे प्यार हो जाता है! थोड़ी देर के लिये वो अपने सपनों की राह से भटकता है पर फिर अपने सपनों की राह पर लौट जाता है।

अयान मुखर्जी ने रणबीर कपूर, दीपिका पादुकोण, कल्कि किकलिन और आदित्य रॉय कपूर जैसे फ़्रेश चेहरों के साथ एक फ़्रेश सी फ़िल्म बनाने की कोशिश की है। और अपनी इस कोशिश में वो काफ़ी हद तक सफल भी रहे हैं। मगर फ़िल्म की कहानी में कुछ भी नया नहीं है। फ़िल्म की कहानी ही सबसे कमज़ोर कड़ी दिखती है। अयान ने इससे पहले वेक अप सिड फ़िल्म बनाई थी जिसके बाद उनसे उम्मीदें काफ़ी बढ़ गयी थी। मगर अयान दर्शकों की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे हैं। वो तो अच्छा है कि अयान ने कलाकारों का चुनाव इतना सही किया है कि फ़िल्म झेली जा सकती है।

पूरी फ़िल्म में रणबीर कपूर ही छाये रहे हैं। रणबीर के रहते फ़िल्म के किसी और किरदार पर ज़्यादा ध्यान ही नहीं गया। रणबीर गाते हैं, नाचते हैं, फ़ाइट करते हैं, रोमांस करते हैं, फ़लर्ट करते हैं..यानी वो सबकुछ करते हैं। दीपिका पादुकोण की नयना कुछ-कुछ करण जौहर की फ़िल्म कल हो ना हो में प्रीति ज़िंटा की नयना से प्रेरित लगती है। वहीं फ़िल्म में विदेश घूमने वाली बात रणबीर और प्रीयंका चोपड़ा की फ़िल्म अंजाना-अंजानी की याद दिलाती है।

कैमरे के पीछे वी.मनीकंदन का काम सराहनीय है। दीपिका ने रणबीर के सामने भी अपनी उपस्थिती दर्ज कराई है। सह-कलाकार के तौर पर कल्कि, फ़ारूख़ शेख़, कुणाल रॉय कपूर, तन्वी आज़मी ने भी अच्छा काम किया है ख़ासकर फ़ारूख़ शेख़ ने रणबीर के पिता की बड़ी ही संजीदा भूमिका निभाई है। दूसरी तरफ़ आदित्य रॉय कपूर ने फिर से निराश किया है, इस फ़िल्म में भी उन्होंने आशिक़ी 2 की तरह ही एक शराबी का किरदार निभाया है। और उनके अभिनय में ज़रा भी दम नहीं है। राणा डग्गुबाटी मेहमान कलाकार के तौर पर दिखे हैं पर अगर ध्यान नहीं दिया तो पलक झपकने के भीतर ही वे गायब भी हो जाते हैं! प्रीतम ने फ़िल्म का संगीत बेहतरीन दिया है। ख़ासकर स्लो गाने में कबीरा और डांस नम्बर्स में बदतमीज़ दिल, बलम पिचकारी, घाघरा गाने अच्छे हैं। वेक अप सिड बनाने के बाद अयान से एक अच्छी फ़िल्म की उम्मीद थी। रणबीर के फ़ैन्स को यह फ़िल्म बेहद पसंद आयेगी क्योंकि रणबीर के अलावा फ़िल्म में कुछ और देखने लायक है ही नहीं!


P.S : बदतमीज़ी एक बीमारी है, ऐसी बीमारी जो धीरे-धीरे वक़्त के साथ बुढ़ापे में बदल जाती है, मैं कहता हूँ जब तक बुढ़ापा नहीं आता..थोड़ी बदतमीज़ी ही कर लेते हैं! ~ बनी/कबीर थापर (रणबीर कपूर)

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गुरुवार, 23 मई 2013



हिंदी सिनेमा को पूरे 100 साल हो गये हैं और इन सौ सालों में हिंदी सिनेमा ने कितने ही उतार चढ़ाव देखे हैं। अनगिनत हीरो देखे और अनगिनत फ़िल्में भी। कभी देव आनंद का दौर देखा तो कभी ट्रैजेडी किंग दिलीप कुमार का, कभी शो-मैन राज कपूर को देखा तो कभी रोमांस किंग राजेश खन्ना को, कभी एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन आये तो कभी किंग ख़ान शाहरुख़ को भी देखा। हर दौर में पिछले से कुछ अलग और नया दिखा मगर एक चीज़ जो कभी नहीं बदली वो थी दर्शकों की दीवानगी और कलाकार का अभिनय।
इन्हीं सौ सालों के पूरे होने के सम्मान में बॉम्बे टॉकीज़ फ़िल्म बनायी गयी है। बॉम्बे टॉकीज़ चार निर्देशकों की बनाई चार छोटी फ़िल्में हैं।

करण जौहरः करण की फ़िल्म समलैंगिकता के मुद्दे पर आधारित है। जहाँ एक बेटा (साक़िब असलम) अपने बाप से विद्रोह कर इसलिये घर छोड़ देता है क्योंकि उसका बाप ये बरदाश्त नहीं कर पाता कि उसका बेटा एक समलैंगिक है। वहीं दूसरी ओर एक न्यूज़ एंकर (रणदीप हुड्डा) समलैंगिक होने के बावजूद अपनी शादी-शुदा ज़िन्दगी को ज़बरदस्ती ढोने की कोशिश करता है लेकिन जब उसकी बीवी (रानी मुखर्जी) को पता लगता है तो वह उसे और ख़ुद को इस बंधन से आज़ाद करती है...हमारे इस समाज में पता नहीं कब लोग आज़ादी से खुलकर समलैंगिकता को अपनायेंगे और समलैंगिकों को भी समाज में बराबरी का दर्जा मिलेगा।

दिबाकर बनर्जीः दिवाकर ने सत्यजीत रे की कहानी पोतोल बाबू फ़िल्मस्टारपर अपनी फ़िल्म बनायी है। जो कि एक संघर्षरत एक्टर पुरंदर (नवाज़ुद्दिन सिद्दिक़ी) की ज़िन्दगी पर आधारित है। पुरंदर को ज़िन्दगी में बहुत कुछ चहिये। वो बिज़नेसमैन भी बनना चाहता है, एक सफल अभिनेता भी और उसे नौकरी भी करने की चाह है। उसकी आँखें तब खुलती हैं जब उसका बाप (सदाशिव अमरापुरकर) सपने में आकर उसे लताड़ता है और उसे उसकी कमियाँ गिनाता है। फ़िल्म के आख़िर के सीन में पुरंदर अपनी बेटी को कहानी सुनाता है जहाँ दर्शकों को कोई आवाज़ नहीं आती केवल फ़िल्म चलती है जिसे देखकर मूक फ़िल्मों का दौर याद आ जाता है। 

ज़ोया अख़्तरः सपने..सभी देखते हैं सपने, चाहे वो बूढ़ा हो, बच्चा हो या जवान मगर छुटपन में देखे सपनों में कोई लालच के भाव नहीं होते वो तो निश्छल भाव में दिल से देखे जाते हैं और उन सपनों को सच करने की चाह भी जुनूनी होती है। ज़ोया की कहानी एक बच्चे (नमन जैन) की ज़िन्दगी पर बनी है। जहाँ बाप (रणवीर शोरे) ज़बरदस्ती अपने मासूम से बच्चे को एक टफ़ मैनबनाने की चाहत में बच्चे के ख़ुद की चाहत भी नहीं पूछता। जबकि बच्चा कटरीना को शीला की जवानी डांस करते देख एक डांसर बनने का सपना देखता है। सपने और उनके संघर्ष के बीच की इस कहानी को ज़ोया ने बड़ी ही ख़ूबसूरती से पिरोया है।

अनुराग कश्यपः इलाहाबाद में एक बीमार बाप (सुधीर पाण्डे) अपने बेटे (विनीत कुमार सिंह) से गुहार लगाता है कि जिस तरह उसने अपने पिता जी को दिलीप कुमार की जूठी शहद खिलाई थी, जिसके बाद वो कई साल जीये थे ठीक उसी तरह उनका बेटा भी उन्हें अमिताभ बच्चन का जूठा मुरब्बा खिला दे तो शायद उनकी तबीयत के भी दिन बहुर जायें। पिता जी की इच्छा को पूरा करने बेटा घर से चल देता है मुम्बई! अनुराग की यह फ़िल्म दिखाती है हिंदी सिनेमा का असर। हिंदी सिनेमा का जुनून लोगों पर इस क़द्र है कि लोगों की आख़िरी इच्छा भी सिनेमा के इर्द-गिर्द ही घूमती नज़र आती है।

हिंदी सिनेमा के सौ सालों के सम्मान में बनी फ़िल्म बॉम्बे टॉकीज़ में भले ही कई लोगों की कोई एक पसंदीदा फ़िल्म हो पर सौ साल के सिनेमा के तोहफ़े के तौर पर बनी यह फ़िल्म शानदार है, और किसी एक निर्देशक की फ़िल्म को चुनना बड़ा ही मुश्किल जान पड़ता है।

P.S: "मेरा डायलॉग क्या है ?" ~ नवाज़ुद्दिन सिद्दिक़ी

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सोमवार, 13 मई 2013


आशिक़ी 2

जुलाई की गर्मी में सन् 1990 में जब महेश भट्ट की आशिक़ी परदे पर आयी तो गर्मी का वह मौसम भी कईयों के लिये ठंडक लेकर आया! रातों-रात फ़िल्म ने कई लोगों की ज़िन्दगियाँ बदल दीं। राहुल रॉय एक स्टार बन गये, नदीम-श्रवण और समीर की तिकड़ी को पहचान मिली, कुमार सानू ने एक सफल प्लेबैक सिंगर के तौर पर अपनी पहचान बनाई, फ़िल्म उस साल की एक बड़ी हिट साबित हुई और कई रिकार्ड्स भी टूटे।

     तेईस साल बाद जब मोहित सुरी ने आशिक़ी 2 बनाई तो फ़िल्म के ट्रेलर देख कर ही फ़िल्म का इंतज़ार किया जाने लगा। फ़िल्म के गाने भी हिट थे सो दर्शकों को फ़िल्म का और बेसब्री से इंतज़ार था। तो क्या फ़िल्म दर्शकों की कसौटी पर खरी उतरी ? जवाब है नहीं..बिल्कुल नहीं..और इसकी सबसे बड़ी वजह है फ़िल्म की कमज़ोर कहानी और उससे भी कमज़ोर अभिनय। आदित्य रॉय कपूर जो कि पहले कुछ फ़िल्मों जैसे – लण्डन ड्रीम्स, गुज़ारिश और एक्शन रिप्ले में बतौर सह-कलाकार काम कर चुके हैं फ़िल्म में लीड रोल में हैं। मगर उनका अभिनय इतना कमज़ोर है कि वह फ़िल्म को बचाता नहीं बल्कि डुबोता है।
     फ़िल्म शुरू होती है रॉकस्टार के तर्ज पर जिसे देखकर ऐसा लगता है कि निर्देशक मोहित सुरी किसी अंग्रेज़ी फ़िल्म की नकल करने के बजाय अपनी हिंदी फ़िल्मों की ही नकल करना पसंद करते हैं और उससे प्रेरित हैं! पुरानी आशिक़ी में प्रेमिका (अनु अग्रवाल) अपने प्रेमी (राहुल रॉय) को करियर में आगे बढ़ाती है और नयी आशिक़ी में ठीक इसके उलट प्रेमी (आदित्य रॉय कपूर) अपनी प्रेमिका (श्रद्धा कपूर) को आगे बढ़ाता है। मगर दिक्कत यह है कि पुरानी आशिक़ी में राहुल सिर्फ़ अनु का आशिक़ है और बस उसी की चाहत करता है मगर नयी आशिक़ी में राहुल जयकर (आदित्य रॉय कपूर) दो चीज़ों का आशिक़ है पहली शराब और दूसरी आरोही (श्रद्धा कपूर), शायद इसी वजह से फ़िल्म का नाम भी आशिक़ी 2 है!
आरोही तो राहुल को दिलो-जान से भी ज़्यादा प्यार करती है..राहुल भी उसे बेइंतहाँ चाहता है मगर राहुल अपनी पहली आशिक़ी यानी शराब को छोड़ नहीं पाता और नशे में डूबता चला जाता है। नाम, पैसा, शोहरत तो सभी कमाना चाहते हैं पर उसे सम्भाल कर रखना बहुत ही मुश्किल होता है ये हर किसी के बस की बात नहीं होती और कुछ ऐसा ही राहुल के साथ भी हुआ। मगर अपने प्यार को उसी बुलंदी पर पहुँचाकर राहुल ख़ुद को उसमें देखता है और इसी बहाने वो भी ख़ुश हो लेता है।

     बेदम अभिनय, कमज़ोर निर्देशन और ख़राब स्क्रिप्ट फ़िल्म को एक बोरियत भरी फ़िल्म बनाते हैं। जहाँ पुरानी आशिक़ी का निर्देशन ख़ुद महेश भट्ट ने किया था और कहानी, अभिनय, संगीत हर तरह से फ़िल्म मज़बूत थी। वहीं नयी आशिक़ी में संगीत छोड़ कुछ भी सराहने लायक नहीं है। जीत गांगुली, मिथुन और अंकित-अंकुर ने मिलकर नदीम-श्रवण की बराबरी करने की पूरी कोशिश की है मगर इसमे कोई दोमत नहीं है कि आशिक़ी में नदीम-श्रवण का संगीत बेजोड़ था। पुरानी आशिक़ी के सामने तो आशिक़ी 2 कहीं नहीं टिकती। श्रद्धा कपूर इस फ़िल्म में एकमात्र आकर्षण का केंद्र हैं। स्क्रीन पर आते ही उनके कुछ कहने से पहले उनकी आँखे ही बहुत कुछ बयाँ कर जाती हैं। सह-कलाकार के नाम पर फ़िल्म में महेश ठाकुर और शाद रंढावा ही हैं, जहाँ महेश ठाकुर ने अंकल जी का अच्छा अभिनय किया है। हैप्पी एंडिंग की आदत वाले दर्शकों को यह फ़िल्म और मायूस कर देगी!

P.S.: बेटे स्टार तो वही बन सकता है जिसकी आवाज़ सुनकर, जिसके गीत सुनकर दिल कहे सीटी मार..सीटी मार ~ अंकल जी (महेश ठाकुर) राहुल (आदित्य रॉय कपूर) से

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सोमवार, 25 मार्च 2013


माफ़ी या सज़ा: आज कल लोगों, न्यूज़ चैनलों और ख़बरों के बीच एक समान सा मुद्दा छाया हुआ है। मुद्दा है क्या संजय दत्त की साढ़े तीन साल की सज़ा माफ़ कर दी जाये ? कई राजनेता भी इसके पक्ष में हैं। उनका मानना है कि संजय दत्त सुधर चुके हैं और अब वह पहले वाले संजय दत्त नहीं रहे! जस्टिस काटजू भी संजय दत्त की सज़ा माफ़ करने के पक्ष में हैं, उनकी तो दलील भी अद्भुत है! उनका मानना है कि संजय दत्त ने अपनी फ़िल्मों के ज़रिये देश को गाँधी गिरीसिखायी है इसी बात पर उनकी सज़ा माफ़ कर दी जानी चाहिये!

एक स्टिंग में जहाँ ख़ुद संजय दत्त के वकील का यह मानना है कि जिस तरह का गुनाह दत्त ने किया है उसके मुक़ाबले उन्हें काफ़ी कम सज़ा मिली है। बकौल दत्त के वकील दत्त से छोटे स्तर क गुनाह करने वाले को भी उनसे ज़्यादा सज़ा मिल जाती है।

मगर दत्त पर इतनी मेहरबानी क्यों ? वो एक अभिनेता हैं, एक बड़ी शख़्सियत हैं, एक हीरो हैं सिर्फ़ इसलिये उनकी सज़ा माफ़ कर दी जाये यह तो कहीं से भी तर्क-संगत और न्याय-संगत नहीं है। फिर तो हर बड़ी हस्ती ख़ुद को क़ानून और न्याय व्यवस्था से ऊपर समझने लगेगी। जनता के बीच क्या संदेश जायेगा कि एक हीरो जो रील लाइफ़ में हीरो हैं उन्हें रीयल लाइफ़ में भी हीरो जैसा ट्रीटमेंट ही मिलता है। उन 257 मृतकों के परिवार वालों को क्या संदेश जायेगा जो 1993 बलास्ट में मारे गये थे। अगर संजय दत्त चाहते तो इस आतंकी गतिविधी की जानकारी पुलिस को दे सकते थे और शायद यह हादसा टल भी सकता था। अफ़सोस उन्होंने ऐसा नहीं किया..

सबसे हास्यास्पद तर्क तो यह है कि संजय दत्त अब सुधर चुके हैं! जब उन्होंने यह जुर्म किया था तब के संजय दत्त और आज के संजय दत्त में बहुत बदलाव आ चुका है! मतलब अगर कोई गुनाह करने के बाद सुधर जाये तो क्या इससे उसका गुनाह कम हो जाता है ? अगर गुनहगार सुधऱ भी जाये तो सज़ा कम होनी चाहिये ना कि सज़ा ही माफ़ कर दी जानी चाहिये। सुप्रीम कोर्ट ने संजय दत्त की सज़ा एक साल कम भी कर दी है मगर सज़ा माफ़ कर देना ग़लत होगा। यह न्याय और क़ानून का अपमान तो होगा ही लेकिन सबसे ग़लत होगा आम और ख़ास आदमी में किया जाने वाला भेदभाव।

बेहतर तो यही होगा कि संजय दत्त अपनी साढ़े तीन साल की सज़ा काटें ताकि जनता को भी ये संदेश जाये कि क़ानून की नज़र में सब बराबर हैं कोई आम नहीं है कोई ख़ास नहीं है।

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शनिवार, 16 मार्च 2013




दो तीन दिनों से दफ़तर के बाहर निकलने पर झा जी और गुप्ता जी की चाय पीने को नहीं मिल रही है। चाचा के पकौड़े और सोनू का पराठा भी खाने को नहीं मिल रहा है। तीन दिन पहले इन सभी और भी कई लोगों की नुक्कड़ और खोमचों पर लगने वाली दुकानें उजड़ी हुई मिलीं। कारण पूछने पर उन लोगों ने बताया अथॉरटी वाले आये थे उन्होंने ऐसा किया। उनका मतलब था कि अधिग्रहण कर प्रशासन ने उनकी दुकानें हटा दीं। कानून की नज़र से तो यह बिल्कुल सही काम है मगर मैं यह जानना चाहता हूँ कि उन सभी लोगों को बेरोज़गार करके क्या हासिल हुआ ? अगर वे बिना किसी की मदद के किसी को परेशान किये बिना अपनी रोज़ी रोटी चला रहे थे तो प्रशासन को इसमें क्या हर्ज था, उन्हें क्या आपत्ती थी ?  वहाँ जितने भी दफ़तर हैं किसी को भी कोई परेशानी महसूस नहीं हुई तो प्रशासन को कौन सी आफ़त आन पड़ी थी ?  इससे तो आप सिर्फ़ बेरोज़गारी और अपराध को ही बढ़ावा दे रहे है। बेरोज़गार ही आगे चल कर अपराध का रुख करते हैं, ये बात नहीं भूलनी चाहिये।

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गुरुवार, 14 मार्च 2013


एन्टी रेप लॉ बिल संसद में पास
लो भईया अब एन्टी रेप लॉ बिल पास हो गया है। किसी भी महिला को घूरने पर, उसका पीछा करने पर ग़ैर ज़मानती वॉरन्ट निकल जायेगा। और इन सभी केसों में लड़की का बयान आख़िरी होगा।
 तो सिर्फ़ घूरने पर ही क्यों देखने पर भी नियम बना दो, ग़लती से आँख मार दी तो उस पर भी वॉरन्ट निकाल दो। विडियोग्राफ़ी करने पर तो वॉरन्ट निकलेगा ही तस्वीर खींचने पर भी वॉरन्ट निकाल दो और अगर तस्वीर लड़की के मन मुताबिक़ ना आई हो तो उम्र क़ैद की सज़ा सुना दो।
बस, ट्रेन, मेट्रो आदि में सफ़र करते हुए अगर किसी महिला को धक्का लग जाए तो उसपर भी वॉरन्ट निकलना चाहिये। ग़लती से भी आप महिला आरक्षित सीट पर बैठ गये तब तो यह एक गुनाह है इस पर तो ग़ैर ज़मानती वॉरन्ट निकलना चाहिये।
आज कल तो सोशल नेटवर्किंग साइट का ज़माना है तो इसे कैसे छोड़ सकते हैं। इस पर भी नकेल कस दी जाए। अन्जान लड़की को फ़ेसबुक पर फ़्रेन्ड रिक्वेस्ट भेजने पर भी वॉरन्ट निकलना चाहिये। लड़की के अपडेट्स पर लाइक और अच्छी कमेंट ना करने पर तो उम्रकैद हो जानी चाहिये। बिना पूछे टैग करने पर भी वॉरन्ट निकलना चाहिये। ना जाने किस टैग को लेकर लड़की की भावनाओं को ठेस पहुँच जाए।
लड़की पर ग़ुस्सा दिखाने पर भी कानून बनना चाहिये और ग़ुस्सा किस लेवल तक का मान्य होगा इसका भी कानून बनना चाहिये और अगर यह बिल्कुल अमान्य है तो इस पर भी कानून होना चाहिये और वॉरन्ट तो ज़रूर निकलना चाहिये।
अब ग़लती से भी अगर कोई लड़की आपके आगे चलती है श्रीमान तो आपके नाम का ग़ैर ज़मानती वॉरन्ट निकल जायेगा तो कभी भी किसी लड़की के पीछे ना चलें हाँ आगे चलते हुए पीछे मुड़कर देखने पर क्या होगा इस पर अब तक कोई कानून नहीं बना लेकिन इसपर भी कानून बनाना चाहिये और वॉरन्ट तो ज़रूर निकलना चाहिये। अगर बराबर में चलते हैं तो ? मेरे ख़याल से इस पर भी कानून बनाकर वॉरन्ट निकाल देना चाहिये। अब तो सीढ़ियाँ चढ़ते और उतरते वक्त भी ख़ासा ध्यान देना होगा ग़लती से भी अगर कोई लड़की आगे हुई तो एन्टी रेप लॉ के तहत पीछा करने की शिकायत दर्ज करा कर ग़ैर ज़मानती वॉरन्ट ना निकलवा दे। इस कानून पर थ्री इडियट्स फ़िल्म का एक डायलॉग याद आता है जिसे अब बदलकर कुछ यूँ कहना चाहिये लाइफ़ इज ए रेस अगर तुम आगे नहीं चलोगे और कोई लड़की तुमसे आगे निकल गयी तो तुम्हारे नाम का ग़ैर जमानती वॉरन्ट निकल जायेगा।
अगर आप लेडीज़ फ़स्ट के जुमले को नहीं अपनाते तब तो वॉरन्ट ज़रूर निकलना चाहिये और वो भी ग़ैर ज़मानती। इसमें लड़की को आगे ना आने देने का केस बनना चाहिये और सख़्त से सख़्त सज़ा का प्रावधान होना चाहिये और अगर उम्र क़ैद हो जाए तो क्या कहने। लड़की को कहीं बाहर ले जाने या कॉफी पीने के प्रस्ताव को भी गम्भीरता से लिया जाना चाहिये और अगर लड़की प्रस्ताव ठुकराती है तो ग़ैर ज़मानती वॉरन्ट निकलना चाहिये।
आख़िर आपने लड़की को इगनॉर करने या चेप होने की हिमाकत की कैसे? इसलिये लड़की को देखकर मुस्कराने, कॉम्प्लिमेंट देने और कॉम्प्लिमेंट ना देने पर भी वॉरन्ट निकलना चाहिये और इस बाबत सज़ा क्या हो ये लड़की ख़ुद तय करे मगर सज़ा सख़्त ज़रूर होनी चाहिये। अब तो मज़ाक भी बचकर करना होगा कहीं लड़की उस मज़ाक को छींटाकशी का नाम देकर वॉरन्ट ना निकलवा दे।

फ़न्डा तो बस ये है कि ये जितने भी कानून बन रहे हैं यह तो सिर्फ़ पुलिस को घूस बटोरने के लिये नये रास्ते बनाये जा रहे हैं और कुछ नहीं। आख़िर घूरने और पीछा करने को आप कैसे माँपेंगे ज़रा बताइये। अगर किसी महिला को देखकर मुझे मेरी किसी जान पहचान वाले से मिलती जुलती शक़्ल लगे और मैं उसके चेहरे को देखते हुए याद करने की कोशिश करूँ तो ? यह तो घूरने की श्रेणी में आ जायेगा। इन चीज़ों को साबित करना मुश़्किल ही नहीं नामुमकिन होगा।

P.S. : ऊपर लिखे गये विचार मैंने केवल इस कानून की कमज़ोरियाँ दिखाने हेतु लिखे हैं। मेरा मक़सद किसी को भी ठेस पहुँचाना नहीं है और ना ही किसी महिला से मेरी दुश्मनी या बैर है..धन्यवाद!

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मंगलवार, 12 मार्च 2013


साहेब बीवी और गैंगस्टर रिटर्नस
चोर चोरी करना छोड़ दे पर हेरा-फेरी से बाज़ नहीं आता..शिकारी शिकार करना छोड़ दे पर वो शिकार करना नहीं भूलता..ठीक उसी तरह एक राजा का भले ही रजवाड़ा ख़त्म हो जाए, भले उसका दरबार ना सजे, उसकी शान-ओ-शौकत चली जाए पर राजशाही फ़ितरत उससे दूर नहीं जाती क्योंकि यह उनके ख़ून में बसती है। ऐसे ही दो राजाओं की कहानी है तिग्मांशु धुलिया की नयी फ़िल्म साहेब बीवी और गैंगस्टर रिटर्नस..एक जो अपने दिमाग़ और ज़िद से राजा बनना चाहता था तो दूसरा पहले को गिराकर ख़ुद राजा बनना चाहता था।
कहानी तो पिछली साहेब बीवी और गैंगस्टर के आगे से ही शुरू होती है। साहेब (जिम्मी शेरगिल्ल) और बीवी (माही गिल्ल) तो वही हैं मगर गैगस्टर (इरफ़ान ख़ान) इस बार नया है। साहेब भी नयी बीवी(सोहा अली ख़ान) लाने की पूरी तैयारी में हैं। पिछली साहेब बीवी और गैंगस्टर में तो बीवी ने गैंगस्टर को तैयार करके मोहरा बनाया था साहेब उर्फ आदित्य प्रताप सिंह का साम्राज्य हथियाने के लिये। मगर इस बार तो इंद्रजीत सिंह (गैंगस्टर) ने ही बीवी को मोहरा बना लिया अपना पुश्तैनी बदला साहेब से लेने के लिये। पर साहेब जो कि व्हील चेयर पर रहता है, इतनी आसानी से हार मानने वालों में से कहाँ था और होता भी क्यों ना आख़िर राजा जो था, उसकी ठसक आज भी वैसी ही थी..रस्सी जलके के बाद भी बल अब तलक ना गया था। कहानी तब मोड़ लेती है जब साहेब अपना दिल इंद्रजीत की प्रेमिका रंजना (सोहा अली ख़ान) पर हार जाते हैं और साम, दाम, दण्ड भेद सब लगा कर रंजना को अपनी नयी बीवी बनाने की कोशिश करते हैं और इस कोशिश में सफल भी होते हैं मगर बदले की आग में जल रहा इंद्रजीत जब बाज़ी हाथ से निकलते हुए देखता है तब अपना आख़िरी दाँव चलता है और जान देकर भी जीत जाता है..और उसे जिताने में माधवी (माही गिल्ल) उसका पूरा साथ देती है क्योंकि उसे साहेब का साम्राज्य जो हथियाना था। हर किसी को कुछ ना कुछ हासिल हुआ- साहेब को हार, माधवी को साहेब का साम्राज्य, इंद्रजीत को जीत बस तनहा रह गयी बेचारी नयी बीवी रंजना।
तिग्मांशु धुलिया और कमल पांडेय ने बड़ी ही दिलचस्प कहानी लिखी है, जो दर्शकों को अंत तक बाँधे रखती है और रोमांच भी अंत तक बना रहता है। हर दूसरे सीन में किरदार कोई ऐसा डायलॉग कहता है जिसपर आप वाह-वाह कर उठेंगे- चाँद पर बाद में जाना ज़माने वालों पहले धरती पर तो रहना सीख लो, डर तो हमेशा लगा रहता है कहीं ये पिस्तौल भी आपकी तरह बेशर्म ना हो जाए, हमें हमेशा मर्द क्यों मिलते हैं शायर क्यों नहीं मिलते... सधा स्क्रीनप्ले, दमदार निर्देशन और चुस्त कहानी फ़िल्म को पूरी तरह से सफल बनाते हैं। जिम्मी शेरगिल्ल और इरफ़ान ख़ान तो अपनी हर फ़िल्म के साथ बेहतर होते जा रहे हैं। सपोर्टिंग रोल में रंजना के पिता की भूमिका में राज बब्बर और इंद्रजीत के भाई के तौर पर प्रवेश राणा ने अच्छी एक्टिंग की है। खासकर प्रवेश को तो देखकर लगा ही नहीं कि यह उनकी पहली फ़िल्म है। तिग्मांशु धुलिया के सफल प्रयास के कारण एक बेहतरीन फ़िल्म देखने को मिली तिग्मांशु दर्शकों की उम्मीद पर खरे उतरे हैं।


P.S: “आपको पता है हम मर्द ज़्यादा गालियाँ क्यों देते हैं ? क्योंकि वो रोते कम हैं” - साहेब उर्फ़ आदित्य प्रताप सिंह रंजना से


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