साहेब बीवी और गैंगस्टर रिटर्नस
चोर चोरी करना छोड़ दे पर हेरा-फेरी से बाज़ नहीं
आता..शिकारी शिकार करना छोड़ दे पर वो शिकार करना नहीं भूलता..ठीक उसी तरह एक राजा
का भले ही रजवाड़ा ख़त्म हो जाए, भले उसका दरबार ना सजे, उसकी शान-ओ-शौकत चली जाए
पर राजशाही फ़ितरत उससे दूर नहीं जाती क्योंकि यह उनके ख़ून में बसती है। ऐसे ही
दो राजाओं की कहानी है तिग्मांशु धुलिया की नयी फ़िल्म साहेब बीवी और गैंगस्टर
रिटर्नस..एक जो अपने दिमाग़ और ज़िद से राजा बनना चाहता था तो दूसरा पहले को
गिराकर ख़ुद राजा बनना चाहता था।
कहानी तो पिछली साहेब बीवी और गैंगस्टर के आगे से ही
शुरू होती है। साहेब (जिम्मी शेरगिल्ल) और बीवी (माही गिल्ल) तो वही हैं मगर
गैगस्टर (इरफ़ान ख़ान) इस बार नया है। साहेब भी नयी बीवी(सोहा अली ख़ान) लाने की
पूरी तैयारी में हैं। पिछली साहेब बीवी और गैंगस्टर में तो बीवी ने गैंगस्टर को
तैयार करके मोहरा बनाया था साहेब उर्फ आदित्य प्रताप सिंह का साम्राज्य हथियाने के
लिये। मगर इस बार तो इंद्रजीत सिंह (गैंगस्टर) ने ही बीवी को मोहरा बना लिया अपना
पुश्तैनी बदला साहेब से लेने के लिये। पर साहेब जो कि व्हील चेयर पर रहता है, इतनी
आसानी से हार मानने वालों में से कहाँ था और होता भी क्यों ना आख़िर राजा जो था,
उसकी ठसक आज भी वैसी ही थी..रस्सी जलके के बाद भी बल अब तलक ना गया था। कहानी तब
मोड़ लेती है जब साहेब अपना दिल इंद्रजीत की प्रेमिका रंजना (सोहा अली ख़ान) पर
हार जाते हैं और साम, दाम, दण्ड भेद सब लगा कर रंजना को अपनी नयी बीवी बनाने की
कोशिश करते हैं और इस कोशिश में सफल भी होते हैं मगर बदले की आग में जल रहा
इंद्रजीत जब बाज़ी हाथ से निकलते हुए देखता है तब अपना आख़िरी दाँव चलता है और जान
देकर भी जीत जाता है..और उसे जिताने में माधवी (माही गिल्ल) उसका पूरा साथ देती है
क्योंकि उसे साहेब का साम्राज्य जो हथियाना था। हर किसी को कुछ ना कुछ हासिल हुआ-
साहेब को हार, माधवी को साहेब का साम्राज्य, इंद्रजीत को जीत बस तनहा रह गयी
बेचारी नयी बीवी रंजना।
तिग्मांशु धुलिया और कमल पांडेय ने बड़ी ही दिलचस्प
कहानी लिखी है, जो दर्शकों को अंत तक बाँधे रखती है और रोमांच भी अंत तक बना रहता
है। हर दूसरे सीन में किरदार कोई ऐसा डायलॉग कहता है जिसपर आप वाह-वाह कर उठेंगे- “चाँद पर बाद में जाना ज़माने वालों पहले धरती पर तो रहना
सीख लो”, “डर तो हमेशा लगा रहता है
कहीं ये पिस्तौल भी आपकी तरह बेशर्म ना हो जाए”, “हमें हमेशा मर्द क्यों
मिलते हैं शायर क्यों नहीं मिलते”... सधा स्क्रीनप्ले,
दमदार निर्देशन और चुस्त कहानी फ़िल्म को पूरी तरह से सफल बनाते हैं। जिम्मी
शेरगिल्ल और इरफ़ान ख़ान तो अपनी हर फ़िल्म के साथ बेहतर होते जा रहे हैं।
सपोर्टिंग रोल में रंजना के पिता की भूमिका में राज बब्बर और इंद्रजीत के भाई के
तौर पर प्रवेश राणा ने अच्छी एक्टिंग की है। खासकर प्रवेश को तो देखकर लगा ही नहीं
कि यह उनकी पहली फ़िल्म है। तिग्मांशु धुलिया के सफल प्रयास के कारण एक बेहतरीन
फ़िल्म देखने को मिली तिग्मांशु दर्शकों की उम्मीद पर खरे उतरे हैं।
P.S: “आपको पता है हम मर्द ज़्यादा गालियाँ क्यों
देते हैं ? क्योंकि वो रोते कम हैं” - साहेब उर्फ़ आदित्य प्रताप सिंह रंजना से
- image courtesy google

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