माफ़ी या सज़ा: आज कल लोगों, न्यूज़ चैनलों और ख़बरों के बीच
एक समान सा मुद्दा छाया हुआ है। मुद्दा है क्या संजय दत्त की साढ़े तीन साल की
सज़ा माफ़ कर दी जाये ? कई राजनेता भी इसके पक्ष में हैं। उनका मानना है कि
संजय दत्त सुधर चुके हैं और अब वह पहले वाले संजय दत्त नहीं रहे! जस्टिस काटजू भी संजय
दत्त की सज़ा माफ़ करने के पक्ष में हैं, उनकी तो दलील भी अद्भुत है! उनका मानना है कि संजय
दत्त ने अपनी फ़िल्मों के ज़रिये देश को ‘गाँधी गिरी’ सिखायी है इसी बात पर उनकी सज़ा माफ़ कर दी
जानी चाहिये!
एक
स्टिंग में जहाँ ख़ुद संजय दत्त के वकील का यह मानना है कि जिस तरह का गुनाह दत्त
ने किया है उसके मुक़ाबले उन्हें काफ़ी कम सज़ा मिली है। बकौल दत्त के वकील दत्त
से छोटे स्तर क गुनाह करने वाले को भी उनसे ज़्यादा सज़ा मिल जाती है।
मगर
दत्त पर इतनी मेहरबानी क्यों ? वो एक अभिनेता हैं, एक बड़ी शख़्सियत हैं, एक हीरो हैं सिर्फ़
इसलिये उनकी सज़ा माफ़ कर दी जाये यह तो कहीं से भी तर्क-संगत और न्याय-संगत नहीं
है। फिर तो हर बड़ी हस्ती ख़ुद को क़ानून और न्याय व्यवस्था से ऊपर समझने लगेगी। जनता
के बीच क्या संदेश जायेगा कि एक हीरो जो रील लाइफ़ में हीरो हैं उन्हें रीयल लाइफ़
में भी हीरो जैसा ट्रीटमेंट ही मिलता है। उन 257 मृतकों के परिवार वालों को क्या
संदेश जायेगा जो 1993 बलास्ट में मारे गये थे। अगर संजय दत्त चाहते तो इस आतंकी
गतिविधी की जानकारी पुलिस को दे सकते थे और शायद यह हादसा टल भी सकता था। अफ़सोस
उन्होंने ऐसा नहीं किया..
सबसे
हास्यास्पद तर्क तो यह है कि संजय दत्त अब सुधर चुके हैं! जब उन्होंने यह जुर्म किया था तब के संजय
दत्त और आज के संजय दत्त में बहुत बदलाव आ चुका है! मतलब अगर कोई गुनाह करने के बाद सुधर जाये तो
क्या इससे उसका गुनाह कम हो जाता है ? अगर गुनहगार सुधऱ भी जाये तो सज़ा कम होनी चाहिये ना कि सज़ा
ही माफ़ कर दी जानी चाहिये। सुप्रीम कोर्ट ने संजय दत्त की सज़ा एक साल कम भी कर
दी है मगर सज़ा माफ़ कर देना ग़लत होगा। यह न्याय और क़ानून का अपमान तो होगा ही
लेकिन सबसे ग़लत होगा आम और ख़ास आदमी में किया जाने वाला भेदभाव।
बेहतर
तो यही होगा कि संजय दत्त अपनी साढ़े तीन साल की सज़ा काटें ताकि जनता को भी ये
संदेश जाये कि क़ानून की नज़र में सब बराबर हैं कोई आम नहीं है कोई ख़ास नहीं है।
~ image courtesy santabanta.com

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