सोमवार, 13 मई 2013


आशिक़ी 2

जुलाई की गर्मी में सन् 1990 में जब महेश भट्ट की आशिक़ी परदे पर आयी तो गर्मी का वह मौसम भी कईयों के लिये ठंडक लेकर आया! रातों-रात फ़िल्म ने कई लोगों की ज़िन्दगियाँ बदल दीं। राहुल रॉय एक स्टार बन गये, नदीम-श्रवण और समीर की तिकड़ी को पहचान मिली, कुमार सानू ने एक सफल प्लेबैक सिंगर के तौर पर अपनी पहचान बनाई, फ़िल्म उस साल की एक बड़ी हिट साबित हुई और कई रिकार्ड्स भी टूटे।

     तेईस साल बाद जब मोहित सुरी ने आशिक़ी 2 बनाई तो फ़िल्म के ट्रेलर देख कर ही फ़िल्म का इंतज़ार किया जाने लगा। फ़िल्म के गाने भी हिट थे सो दर्शकों को फ़िल्म का और बेसब्री से इंतज़ार था। तो क्या फ़िल्म दर्शकों की कसौटी पर खरी उतरी ? जवाब है नहीं..बिल्कुल नहीं..और इसकी सबसे बड़ी वजह है फ़िल्म की कमज़ोर कहानी और उससे भी कमज़ोर अभिनय। आदित्य रॉय कपूर जो कि पहले कुछ फ़िल्मों जैसे – लण्डन ड्रीम्स, गुज़ारिश और एक्शन रिप्ले में बतौर सह-कलाकार काम कर चुके हैं फ़िल्म में लीड रोल में हैं। मगर उनका अभिनय इतना कमज़ोर है कि वह फ़िल्म को बचाता नहीं बल्कि डुबोता है।
     फ़िल्म शुरू होती है रॉकस्टार के तर्ज पर जिसे देखकर ऐसा लगता है कि निर्देशक मोहित सुरी किसी अंग्रेज़ी फ़िल्म की नकल करने के बजाय अपनी हिंदी फ़िल्मों की ही नकल करना पसंद करते हैं और उससे प्रेरित हैं! पुरानी आशिक़ी में प्रेमिका (अनु अग्रवाल) अपने प्रेमी (राहुल रॉय) को करियर में आगे बढ़ाती है और नयी आशिक़ी में ठीक इसके उलट प्रेमी (आदित्य रॉय कपूर) अपनी प्रेमिका (श्रद्धा कपूर) को आगे बढ़ाता है। मगर दिक्कत यह है कि पुरानी आशिक़ी में राहुल सिर्फ़ अनु का आशिक़ है और बस उसी की चाहत करता है मगर नयी आशिक़ी में राहुल जयकर (आदित्य रॉय कपूर) दो चीज़ों का आशिक़ है पहली शराब और दूसरी आरोही (श्रद्धा कपूर), शायद इसी वजह से फ़िल्म का नाम भी आशिक़ी 2 है!
आरोही तो राहुल को दिलो-जान से भी ज़्यादा प्यार करती है..राहुल भी उसे बेइंतहाँ चाहता है मगर राहुल अपनी पहली आशिक़ी यानी शराब को छोड़ नहीं पाता और नशे में डूबता चला जाता है। नाम, पैसा, शोहरत तो सभी कमाना चाहते हैं पर उसे सम्भाल कर रखना बहुत ही मुश्किल होता है ये हर किसी के बस की बात नहीं होती और कुछ ऐसा ही राहुल के साथ भी हुआ। मगर अपने प्यार को उसी बुलंदी पर पहुँचाकर राहुल ख़ुद को उसमें देखता है और इसी बहाने वो भी ख़ुश हो लेता है।

     बेदम अभिनय, कमज़ोर निर्देशन और ख़राब स्क्रिप्ट फ़िल्म को एक बोरियत भरी फ़िल्म बनाते हैं। जहाँ पुरानी आशिक़ी का निर्देशन ख़ुद महेश भट्ट ने किया था और कहानी, अभिनय, संगीत हर तरह से फ़िल्म मज़बूत थी। वहीं नयी आशिक़ी में संगीत छोड़ कुछ भी सराहने लायक नहीं है। जीत गांगुली, मिथुन और अंकित-अंकुर ने मिलकर नदीम-श्रवण की बराबरी करने की पूरी कोशिश की है मगर इसमे कोई दोमत नहीं है कि आशिक़ी में नदीम-श्रवण का संगीत बेजोड़ था। पुरानी आशिक़ी के सामने तो आशिक़ी 2 कहीं नहीं टिकती। श्रद्धा कपूर इस फ़िल्म में एकमात्र आकर्षण का केंद्र हैं। स्क्रीन पर आते ही उनके कुछ कहने से पहले उनकी आँखे ही बहुत कुछ बयाँ कर जाती हैं। सह-कलाकार के नाम पर फ़िल्म में महेश ठाकुर और शाद रंढावा ही हैं, जहाँ महेश ठाकुर ने अंकल जी का अच्छा अभिनय किया है। हैप्पी एंडिंग की आदत वाले दर्शकों को यह फ़िल्म और मायूस कर देगी!

P.S.: बेटे स्टार तो वही बन सकता है जिसकी आवाज़ सुनकर, जिसके गीत सुनकर दिल कहे सीटी मार..सीटी मार ~ अंकल जी (महेश ठाकुर) राहुल (आदित्य रॉय कपूर) से

image courtesy ~ google

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