गुरुवार, 23 मई 2013



हिंदी सिनेमा को पूरे 100 साल हो गये हैं और इन सौ सालों में हिंदी सिनेमा ने कितने ही उतार चढ़ाव देखे हैं। अनगिनत हीरो देखे और अनगिनत फ़िल्में भी। कभी देव आनंद का दौर देखा तो कभी ट्रैजेडी किंग दिलीप कुमार का, कभी शो-मैन राज कपूर को देखा तो कभी रोमांस किंग राजेश खन्ना को, कभी एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन आये तो कभी किंग ख़ान शाहरुख़ को भी देखा। हर दौर में पिछले से कुछ अलग और नया दिखा मगर एक चीज़ जो कभी नहीं बदली वो थी दर्शकों की दीवानगी और कलाकार का अभिनय।
इन्हीं सौ सालों के पूरे होने के सम्मान में बॉम्बे टॉकीज़ फ़िल्म बनायी गयी है। बॉम्बे टॉकीज़ चार निर्देशकों की बनाई चार छोटी फ़िल्में हैं।

करण जौहरः करण की फ़िल्म समलैंगिकता के मुद्दे पर आधारित है। जहाँ एक बेटा (साक़िब असलम) अपने बाप से विद्रोह कर इसलिये घर छोड़ देता है क्योंकि उसका बाप ये बरदाश्त नहीं कर पाता कि उसका बेटा एक समलैंगिक है। वहीं दूसरी ओर एक न्यूज़ एंकर (रणदीप हुड्डा) समलैंगिक होने के बावजूद अपनी शादी-शुदा ज़िन्दगी को ज़बरदस्ती ढोने की कोशिश करता है लेकिन जब उसकी बीवी (रानी मुखर्जी) को पता लगता है तो वह उसे और ख़ुद को इस बंधन से आज़ाद करती है...हमारे इस समाज में पता नहीं कब लोग आज़ादी से खुलकर समलैंगिकता को अपनायेंगे और समलैंगिकों को भी समाज में बराबरी का दर्जा मिलेगा।

दिबाकर बनर्जीः दिवाकर ने सत्यजीत रे की कहानी पोतोल बाबू फ़िल्मस्टारपर अपनी फ़िल्म बनायी है। जो कि एक संघर्षरत एक्टर पुरंदर (नवाज़ुद्दिन सिद्दिक़ी) की ज़िन्दगी पर आधारित है। पुरंदर को ज़िन्दगी में बहुत कुछ चहिये। वो बिज़नेसमैन भी बनना चाहता है, एक सफल अभिनेता भी और उसे नौकरी भी करने की चाह है। उसकी आँखें तब खुलती हैं जब उसका बाप (सदाशिव अमरापुरकर) सपने में आकर उसे लताड़ता है और उसे उसकी कमियाँ गिनाता है। फ़िल्म के आख़िर के सीन में पुरंदर अपनी बेटी को कहानी सुनाता है जहाँ दर्शकों को कोई आवाज़ नहीं आती केवल फ़िल्म चलती है जिसे देखकर मूक फ़िल्मों का दौर याद आ जाता है। 

ज़ोया अख़्तरः सपने..सभी देखते हैं सपने, चाहे वो बूढ़ा हो, बच्चा हो या जवान मगर छुटपन में देखे सपनों में कोई लालच के भाव नहीं होते वो तो निश्छल भाव में दिल से देखे जाते हैं और उन सपनों को सच करने की चाह भी जुनूनी होती है। ज़ोया की कहानी एक बच्चे (नमन जैन) की ज़िन्दगी पर बनी है। जहाँ बाप (रणवीर शोरे) ज़बरदस्ती अपने मासूम से बच्चे को एक टफ़ मैनबनाने की चाहत में बच्चे के ख़ुद की चाहत भी नहीं पूछता। जबकि बच्चा कटरीना को शीला की जवानी डांस करते देख एक डांसर बनने का सपना देखता है। सपने और उनके संघर्ष के बीच की इस कहानी को ज़ोया ने बड़ी ही ख़ूबसूरती से पिरोया है।

अनुराग कश्यपः इलाहाबाद में एक बीमार बाप (सुधीर पाण्डे) अपने बेटे (विनीत कुमार सिंह) से गुहार लगाता है कि जिस तरह उसने अपने पिता जी को दिलीप कुमार की जूठी शहद खिलाई थी, जिसके बाद वो कई साल जीये थे ठीक उसी तरह उनका बेटा भी उन्हें अमिताभ बच्चन का जूठा मुरब्बा खिला दे तो शायद उनकी तबीयत के भी दिन बहुर जायें। पिता जी की इच्छा को पूरा करने बेटा घर से चल देता है मुम्बई! अनुराग की यह फ़िल्म दिखाती है हिंदी सिनेमा का असर। हिंदी सिनेमा का जुनून लोगों पर इस क़द्र है कि लोगों की आख़िरी इच्छा भी सिनेमा के इर्द-गिर्द ही घूमती नज़र आती है।

हिंदी सिनेमा के सौ सालों के सम्मान में बनी फ़िल्म बॉम्बे टॉकीज़ में भले ही कई लोगों की कोई एक पसंदीदा फ़िल्म हो पर सौ साल के सिनेमा के तोहफ़े के तौर पर बनी यह फ़िल्म शानदार है, और किसी एक निर्देशक की फ़िल्म को चुनना बड़ा ही मुश्किल जान पड़ता है।

P.S: "मेरा डायलॉग क्या है ?" ~ नवाज़ुद्दिन सिद्दिक़ी

image courtesy ~ google

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