मंगलवार, 11 जून 2013

ये जवानी है दिवानी
सपने..हर रोज़ हम देखते हैं सपने। कई बार उन सपनों को पूरा करने की कोशिश भी करते हैं हम। कुछ सपने पूरे होते हैं तो बहुतेरे अधूरे रह जाते है। बावजूद इसके हम सपने देखना नहीं छोड़ते। हम कभी ख़ुद के बजाय अपने अपनों के सपने भी पूरे करने की कोशिश में अपनी ज़िन्दगी के अनमोल पल लगा देते हैं। पर अपने सपनों के पीछे भागना और वो भी इतनी शिद्दत से कि उन सपनों को जीने का मौका मिल जाय तो फिर बात ही क्या है!

अयान मुखर्जी की फ़िल्म ये जवानी है दीवानी भी सपनों के पीछे भागते एक शख़्स की कहानी है। बनी उर्फ़ कबीर थापर (रणबीर कपूर) का सपना है कि वह पूरी दुनिया घूम सके और इसके लिये वो कुछ भी करने को तैयार है। क्योंकि उसके लिये उसके सपने ही सबकुछ हैं। अपने सपनों से ज़्यादा उसकी ज़िन्दगी में कुछ भी मायने ही नहीं रखता। वो अपने सपनों को जीना चाहता है और इसकी उसे भारी कीमत भी चुकानी पड़ती है पर फिर भी वो अपने सपनों का पीछा नहीं छोड़ता। मगर उसकी इस दौड़ में खलल तब पड़ती है जब उसे राह में नयना (दीपिका पादुकोण) मिलती है और बनी को उससे प्यार हो जाता है! थोड़ी देर के लिये वो अपने सपनों की राह से भटकता है पर फिर अपने सपनों की राह पर लौट जाता है।

अयान मुखर्जी ने रणबीर कपूर, दीपिका पादुकोण, कल्कि किकलिन और आदित्य रॉय कपूर जैसे फ़्रेश चेहरों के साथ एक फ़्रेश सी फ़िल्म बनाने की कोशिश की है। और अपनी इस कोशिश में वो काफ़ी हद तक सफल भी रहे हैं। मगर फ़िल्म की कहानी में कुछ भी नया नहीं है। फ़िल्म की कहानी ही सबसे कमज़ोर कड़ी दिखती है। अयान ने इससे पहले वेक अप सिड फ़िल्म बनाई थी जिसके बाद उनसे उम्मीदें काफ़ी बढ़ गयी थी। मगर अयान दर्शकों की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे हैं। वो तो अच्छा है कि अयान ने कलाकारों का चुनाव इतना सही किया है कि फ़िल्म झेली जा सकती है।

पूरी फ़िल्म में रणबीर कपूर ही छाये रहे हैं। रणबीर के रहते फ़िल्म के किसी और किरदार पर ज़्यादा ध्यान ही नहीं गया। रणबीर गाते हैं, नाचते हैं, फ़ाइट करते हैं, रोमांस करते हैं, फ़लर्ट करते हैं..यानी वो सबकुछ करते हैं। दीपिका पादुकोण की नयना कुछ-कुछ करण जौहर की फ़िल्म कल हो ना हो में प्रीति ज़िंटा की नयना से प्रेरित लगती है। वहीं फ़िल्म में विदेश घूमने वाली बात रणबीर और प्रीयंका चोपड़ा की फ़िल्म अंजाना-अंजानी की याद दिलाती है।

कैमरे के पीछे वी.मनीकंदन का काम सराहनीय है। दीपिका ने रणबीर के सामने भी अपनी उपस्थिती दर्ज कराई है। सह-कलाकार के तौर पर कल्कि, फ़ारूख़ शेख़, कुणाल रॉय कपूर, तन्वी आज़मी ने भी अच्छा काम किया है ख़ासकर फ़ारूख़ शेख़ ने रणबीर के पिता की बड़ी ही संजीदा भूमिका निभाई है। दूसरी तरफ़ आदित्य रॉय कपूर ने फिर से निराश किया है, इस फ़िल्म में भी उन्होंने आशिक़ी 2 की तरह ही एक शराबी का किरदार निभाया है। और उनके अभिनय में ज़रा भी दम नहीं है। राणा डग्गुबाटी मेहमान कलाकार के तौर पर दिखे हैं पर अगर ध्यान नहीं दिया तो पलक झपकने के भीतर ही वे गायब भी हो जाते हैं! प्रीतम ने फ़िल्म का संगीत बेहतरीन दिया है। ख़ासकर स्लो गाने में कबीरा और डांस नम्बर्स में बदतमीज़ दिल, बलम पिचकारी, घाघरा गाने अच्छे हैं। वेक अप सिड बनाने के बाद अयान से एक अच्छी फ़िल्म की उम्मीद थी। रणबीर के फ़ैन्स को यह फ़िल्म बेहद पसंद आयेगी क्योंकि रणबीर के अलावा फ़िल्म में कुछ और देखने लायक है ही नहीं!


P.S : बदतमीज़ी एक बीमारी है, ऐसी बीमारी जो धीरे-धीरे वक़्त के साथ बुढ़ापे में बदल जाती है, मैं कहता हूँ जब तक बुढ़ापा नहीं आता..थोड़ी बदतमीज़ी ही कर लेते हैं! ~ बनी/कबीर थापर (रणबीर कपूर)

image courtesy - google

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