शुक्रवार, 21 जून 2013

रांझणा
प्यार..ये उपर वाले की बनायी हुई वो नेमत है जो किसी को भी कभी भी, किसी भी उम्र में हो सकता है। कभी ये पहली नज़र में हो जाता है तो कभी इसे समझना बड़ा मुश्किल हो जाता है। कभी इसे समझने में पूरी उम्र लग जाती है। फिर भी हम इसे समझ नहीं पाते। लेकिन अपने दिल को और उस दिल में बसी चाहत को छुपाना या दबाना आसान नहीं होता। सच ये भी है कि इस दिल पर कोई ज़ोर नहीं चलता और प्यार जब होना होता है तब हो जाता है। अपने प्यार की एक झलक, उसकी एक मुस्कान, उसकी हँसी सब कुछ ख़ुद अपने से जान पड़ते हैं और दिल चाहता है कि बस वक़्त यहीं ठहर जाये।

आनंद.एल राय की नयी फ़िल्म रांझणा भी एक ऐसी ही प्रेम कहानी है, जहाँ कुंदन (धनुष) को छुटपन में ही ज़ोया (सोनम कपूर) से पहली ही नज़र में प्यार हो जाता है और वो भी शिद्दत वाला प्यार। ये प्यार बचपन से शुरू होकर जवानी तक रहता है। लड़का भी बनारसी है वो भी पंडित, आसानी से हार मानने वालों में से नहीं है क्योंकि उसे भी पता है कि लड़की इतनी आसानी से मानने वाली नहीं है। सोलह थप्पड़ खाकर लड़की का नाम तो जान लेता है और नस काटकर उससे प्यार का इज़हार भी करवा लेता है। लेकिन फिर लड़की के बाप (कुमुद मिश्रा) कहानी में ट्विस्ट लाते हैं और हर बाप की तरह इन दो प्यार करने वाले किशोरों को जुदा कर देते हैं। जवान होने के बाद ज़ोया किसी और (अभय देओल) को चाहने लगती है। लेकिन कहानी का सबसे बड़ा ट्विस्ट तब आता है जब इस प्यार में राजनीति घुलने लग जाती है। जो कि इस प्रेम कहानी को बड़ा ही भयावह रूप देती है और एक दुखद अंत भी।

हिमांशु शर्मा ने फ़िल्म की एक बड़ी ही अलग तरह की कहानी लिखने की कोशिश की है और फ़िल्म को प्रेम कहानी से लेकर राजनीति तक जोड़ा है। मगर इतनी सारी चीज़ें एक साथ दर्शक शायद पचा ना पायें। लेकिन हिमांशु ने बनारस को ध्यान में रखते हुए फ़िल्म के डायलॉग बड़े ही धाँसू लिखे हैं। जिस वजह से फ़िल्म देखने में मन लगता है।  मसलन साले प्यार ना हुआ यू.पी.एस.सी का इग्ज़ाम हो गया जो दस साल से क्लीयर ही नहीं होता!’,ये बनारस है और अगर लौण्डा साला यहाँ भी हार गया तो जीतेगा कहाँ ?’, आशिक़ की तब नहीं फटती जब उसकी महबूबा की शादी होती है, उसकी तब फटती है जब उसकी शादी होती है। नटराजन सुब्रमण्यम और विशाल सिन्हा की सिनेमैटोग्राफी शानदार है। जिस सहजता से इन्होंने कैमरे के ज़रिये बनारस को परदे पर उतारा है वह देखते ही बनता है।

इंटरवल के पहले तक तो फ़िल्म शानदार है कॉमेडी और रोमांस सबका तड़का भी भरपूर है मगर इंटरवल के बाद फ़िल्म थोड़ी अपनी लय खो देती है मगर वापस फिर से ट्रैक पर आ जाती है। फ़िल्म का संगीत रहमान ने बहुत ख़बसूरत दिया है और गानों की टाइमिंग भी सही है। ख़ासकर फ़िल्म का टाइटल ट्रैक रांझणा, तुम तक, तू मनसुड़ी’, ऐसे ना देखो। सभी गाने अच्छे हैं जो फ़िल्म देखते वक़्त बोर नहीं होने देते।

धनुष ने बहुत ही उम्दा एक्टिंग की है। धनुष की डायलॉग डिलेवरी, उनके एक्सप्रेशन बेहद शानदार हैं। बनारस के लौण्डे के रोल में वो बिल्कुल समा से गये हैं। सोनम की एक्टिंग ठीक-ठाक है जो कि दिल्ली 6 की याद दिलाती है। अभय देओल ने मेहमान कलाकार का अच्छा रोल किया है। सपोर्टिंग रोल में मो. ज़ीशान आयूब ने धनुष के दोस्त मुरारी का दमदार अभिनय किया है। साल के सर्वश्रेस्ठ सह-कलाकार का ख़िताब अगर ज़िशान को मिलता है तो उसमें कोई चौंकने वाली बात नहीं होगी। आनंद.एल राय ने तनु वेड्स मनु की पायल को इस फ़िल्म में भी बिंदिया (स्वारा भास्कर) के तौर पर दोहराया है जो कि यू.पी की लड़की के रोल में बिल्कुल फ़िट बैठती हैं। बड़े दिनों बाद रॉकस्टार के खटारा भाई यानी कुमुद मिश्रा ने भी ज़ोया के अब्बा का अच्छा रोल निभाया है पर उन्हें पहचानना थोड़ा मुश्किल है!

रहमान का संगीत, हिमांशु शर्मा के डायलॉग, धनुष की एक्टिंग और प्यार- ये चार चीज़े इस फ़िल्म में देखने लायक हैं।

P.S: ‘रॉकेट और लड़की किसी को कहीं भी पहुँचा सकते हैं!’ ~ कुंदन (धनुष)

image courtesy - google

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