दो तीन दिनों से दफ़तर के बाहर निकलने पर झा जी
और गुप्ता जी की चाय पीने को नहीं मिल रही है। चाचा के पकौड़े और सोनू का पराठा भी
खाने को नहीं मिल रहा है। तीन दिन पहले इन सभी और भी कई लोगों की नुक्कड़ और
खोमचों पर लगने वाली दुकानें उजड़ी हुई मिलीं। कारण पूछने पर उन लोगों ने बताया
अथॉरटी वाले आये थे उन्होंने ऐसा किया। उनका मतलब था कि अधिग्रहण कर प्रशासन ने
उनकी दुकानें हटा दीं। कानून की नज़र से तो यह बिल्कुल सही काम है मगर मैं यह
जानना चाहता हूँ कि उन सभी लोगों को बेरोज़गार करके क्या हासिल हुआ ? अगर वे बिना किसी की मदद
के किसी को परेशान किये बिना अपनी रोज़ी रोटी चला रहे थे तो प्रशासन को इसमें क्या
हर्ज था, उन्हें क्या आपत्ती थी ? वहाँ जितने भी दफ़तर हैं किसी को भी कोई परेशानी महसूस
नहीं हुई तो प्रशासन को कौन सी आफ़त आन पड़ी थी ? इससे तो आप सिर्फ़ बेरोज़गारी
और अपराध को ही बढ़ावा दे रहे है। बेरोज़गार ही आगे चल कर अपराध का रुख करते हैं,
ये बात नहीं भूलनी चाहिये।
~ image courtesy © vinay singh clicked by me only

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