शुक्रवार, 21 जून 2013

रांझणा
प्यार..ये उपर वाले की बनायी हुई वो नेमत है जो किसी को भी कभी भी, किसी भी उम्र में हो सकता है। कभी ये पहली नज़र में हो जाता है तो कभी इसे समझना बड़ा मुश्किल हो जाता है। कभी इसे समझने में पूरी उम्र लग जाती है। फिर भी हम इसे समझ नहीं पाते। लेकिन अपने दिल को और उस दिल में बसी चाहत को छुपाना या दबाना आसान नहीं होता। सच ये भी है कि इस दिल पर कोई ज़ोर नहीं चलता और प्यार जब होना होता है तब हो जाता है। अपने प्यार की एक झलक, उसकी एक मुस्कान, उसकी हँसी सब कुछ ख़ुद अपने से जान पड़ते हैं और दिल चाहता है कि बस वक़्त यहीं ठहर जाये।

आनंद.एल राय की नयी फ़िल्म रांझणा भी एक ऐसी ही प्रेम कहानी है, जहाँ कुंदन (धनुष) को छुटपन में ही ज़ोया (सोनम कपूर) से पहली ही नज़र में प्यार हो जाता है और वो भी शिद्दत वाला प्यार। ये प्यार बचपन से शुरू होकर जवानी तक रहता है। लड़का भी बनारसी है वो भी पंडित, आसानी से हार मानने वालों में से नहीं है क्योंकि उसे भी पता है कि लड़की इतनी आसानी से मानने वाली नहीं है। सोलह थप्पड़ खाकर लड़की का नाम तो जान लेता है और नस काटकर उससे प्यार का इज़हार भी करवा लेता है। लेकिन फिर लड़की के बाप (कुमुद मिश्रा) कहानी में ट्विस्ट लाते हैं और हर बाप की तरह इन दो प्यार करने वाले किशोरों को जुदा कर देते हैं। जवान होने के बाद ज़ोया किसी और (अभय देओल) को चाहने लगती है। लेकिन कहानी का सबसे बड़ा ट्विस्ट तब आता है जब इस प्यार में राजनीति घुलने लग जाती है। जो कि इस प्रेम कहानी को बड़ा ही भयावह रूप देती है और एक दुखद अंत भी।

हिमांशु शर्मा ने फ़िल्म की एक बड़ी ही अलग तरह की कहानी लिखने की कोशिश की है और फ़िल्म को प्रेम कहानी से लेकर राजनीति तक जोड़ा है। मगर इतनी सारी चीज़ें एक साथ दर्शक शायद पचा ना पायें। लेकिन हिमांशु ने बनारस को ध्यान में रखते हुए फ़िल्म के डायलॉग बड़े ही धाँसू लिखे हैं। जिस वजह से फ़िल्म देखने में मन लगता है।  मसलन साले प्यार ना हुआ यू.पी.एस.सी का इग्ज़ाम हो गया जो दस साल से क्लीयर ही नहीं होता!’,ये बनारस है और अगर लौण्डा साला यहाँ भी हार गया तो जीतेगा कहाँ ?’, आशिक़ की तब नहीं फटती जब उसकी महबूबा की शादी होती है, उसकी तब फटती है जब उसकी शादी होती है। नटराजन सुब्रमण्यम और विशाल सिन्हा की सिनेमैटोग्राफी शानदार है। जिस सहजता से इन्होंने कैमरे के ज़रिये बनारस को परदे पर उतारा है वह देखते ही बनता है।

इंटरवल के पहले तक तो फ़िल्म शानदार है कॉमेडी और रोमांस सबका तड़का भी भरपूर है मगर इंटरवल के बाद फ़िल्म थोड़ी अपनी लय खो देती है मगर वापस फिर से ट्रैक पर आ जाती है। फ़िल्म का संगीत रहमान ने बहुत ख़बसूरत दिया है और गानों की टाइमिंग भी सही है। ख़ासकर फ़िल्म का टाइटल ट्रैक रांझणा, तुम तक, तू मनसुड़ी’, ऐसे ना देखो। सभी गाने अच्छे हैं जो फ़िल्म देखते वक़्त बोर नहीं होने देते।

धनुष ने बहुत ही उम्दा एक्टिंग की है। धनुष की डायलॉग डिलेवरी, उनके एक्सप्रेशन बेहद शानदार हैं। बनारस के लौण्डे के रोल में वो बिल्कुल समा से गये हैं। सोनम की एक्टिंग ठीक-ठाक है जो कि दिल्ली 6 की याद दिलाती है। अभय देओल ने मेहमान कलाकार का अच्छा रोल किया है। सपोर्टिंग रोल में मो. ज़ीशान आयूब ने धनुष के दोस्त मुरारी का दमदार अभिनय किया है। साल के सर्वश्रेस्ठ सह-कलाकार का ख़िताब अगर ज़िशान को मिलता है तो उसमें कोई चौंकने वाली बात नहीं होगी। आनंद.एल राय ने तनु वेड्स मनु की पायल को इस फ़िल्म में भी बिंदिया (स्वारा भास्कर) के तौर पर दोहराया है जो कि यू.पी की लड़की के रोल में बिल्कुल फ़िट बैठती हैं। बड़े दिनों बाद रॉकस्टार के खटारा भाई यानी कुमुद मिश्रा ने भी ज़ोया के अब्बा का अच्छा रोल निभाया है पर उन्हें पहचानना थोड़ा मुश्किल है!

रहमान का संगीत, हिमांशु शर्मा के डायलॉग, धनुष की एक्टिंग और प्यार- ये चार चीज़े इस फ़िल्म में देखने लायक हैं।

P.S: ‘रॉकेट और लड़की किसी को कहीं भी पहुँचा सकते हैं!’ ~ कुंदन (धनुष)

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मंगलवार, 11 जून 2013

ये जवानी है दिवानी
सपने..हर रोज़ हम देखते हैं सपने। कई बार उन सपनों को पूरा करने की कोशिश भी करते हैं हम। कुछ सपने पूरे होते हैं तो बहुतेरे अधूरे रह जाते है। बावजूद इसके हम सपने देखना नहीं छोड़ते। हम कभी ख़ुद के बजाय अपने अपनों के सपने भी पूरे करने की कोशिश में अपनी ज़िन्दगी के अनमोल पल लगा देते हैं। पर अपने सपनों के पीछे भागना और वो भी इतनी शिद्दत से कि उन सपनों को जीने का मौका मिल जाय तो फिर बात ही क्या है!

अयान मुखर्जी की फ़िल्म ये जवानी है दीवानी भी सपनों के पीछे भागते एक शख़्स की कहानी है। बनी उर्फ़ कबीर थापर (रणबीर कपूर) का सपना है कि वह पूरी दुनिया घूम सके और इसके लिये वो कुछ भी करने को तैयार है। क्योंकि उसके लिये उसके सपने ही सबकुछ हैं। अपने सपनों से ज़्यादा उसकी ज़िन्दगी में कुछ भी मायने ही नहीं रखता। वो अपने सपनों को जीना चाहता है और इसकी उसे भारी कीमत भी चुकानी पड़ती है पर फिर भी वो अपने सपनों का पीछा नहीं छोड़ता। मगर उसकी इस दौड़ में खलल तब पड़ती है जब उसे राह में नयना (दीपिका पादुकोण) मिलती है और बनी को उससे प्यार हो जाता है! थोड़ी देर के लिये वो अपने सपनों की राह से भटकता है पर फिर अपने सपनों की राह पर लौट जाता है।

अयान मुखर्जी ने रणबीर कपूर, दीपिका पादुकोण, कल्कि किकलिन और आदित्य रॉय कपूर जैसे फ़्रेश चेहरों के साथ एक फ़्रेश सी फ़िल्म बनाने की कोशिश की है। और अपनी इस कोशिश में वो काफ़ी हद तक सफल भी रहे हैं। मगर फ़िल्म की कहानी में कुछ भी नया नहीं है। फ़िल्म की कहानी ही सबसे कमज़ोर कड़ी दिखती है। अयान ने इससे पहले वेक अप सिड फ़िल्म बनाई थी जिसके बाद उनसे उम्मीदें काफ़ी बढ़ गयी थी। मगर अयान दर्शकों की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे हैं। वो तो अच्छा है कि अयान ने कलाकारों का चुनाव इतना सही किया है कि फ़िल्म झेली जा सकती है।

पूरी फ़िल्म में रणबीर कपूर ही छाये रहे हैं। रणबीर के रहते फ़िल्म के किसी और किरदार पर ज़्यादा ध्यान ही नहीं गया। रणबीर गाते हैं, नाचते हैं, फ़ाइट करते हैं, रोमांस करते हैं, फ़लर्ट करते हैं..यानी वो सबकुछ करते हैं। दीपिका पादुकोण की नयना कुछ-कुछ करण जौहर की फ़िल्म कल हो ना हो में प्रीति ज़िंटा की नयना से प्रेरित लगती है। वहीं फ़िल्म में विदेश घूमने वाली बात रणबीर और प्रीयंका चोपड़ा की फ़िल्म अंजाना-अंजानी की याद दिलाती है।

कैमरे के पीछे वी.मनीकंदन का काम सराहनीय है। दीपिका ने रणबीर के सामने भी अपनी उपस्थिती दर्ज कराई है। सह-कलाकार के तौर पर कल्कि, फ़ारूख़ शेख़, कुणाल रॉय कपूर, तन्वी आज़मी ने भी अच्छा काम किया है ख़ासकर फ़ारूख़ शेख़ ने रणबीर के पिता की बड़ी ही संजीदा भूमिका निभाई है। दूसरी तरफ़ आदित्य रॉय कपूर ने फिर से निराश किया है, इस फ़िल्म में भी उन्होंने आशिक़ी 2 की तरह ही एक शराबी का किरदार निभाया है। और उनके अभिनय में ज़रा भी दम नहीं है। राणा डग्गुबाटी मेहमान कलाकार के तौर पर दिखे हैं पर अगर ध्यान नहीं दिया तो पलक झपकने के भीतर ही वे गायब भी हो जाते हैं! प्रीतम ने फ़िल्म का संगीत बेहतरीन दिया है। ख़ासकर स्लो गाने में कबीरा और डांस नम्बर्स में बदतमीज़ दिल, बलम पिचकारी, घाघरा गाने अच्छे हैं। वेक अप सिड बनाने के बाद अयान से एक अच्छी फ़िल्म की उम्मीद थी। रणबीर के फ़ैन्स को यह फ़िल्म बेहद पसंद आयेगी क्योंकि रणबीर के अलावा फ़िल्म में कुछ और देखने लायक है ही नहीं!


P.S : बदतमीज़ी एक बीमारी है, ऐसी बीमारी जो धीरे-धीरे वक़्त के साथ बुढ़ापे में बदल जाती है, मैं कहता हूँ जब तक बुढ़ापा नहीं आता..थोड़ी बदतमीज़ी ही कर लेते हैं! ~ बनी/कबीर थापर (रणबीर कपूर)

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गुरुवार, 23 मई 2013



हिंदी सिनेमा को पूरे 100 साल हो गये हैं और इन सौ सालों में हिंदी सिनेमा ने कितने ही उतार चढ़ाव देखे हैं। अनगिनत हीरो देखे और अनगिनत फ़िल्में भी। कभी देव आनंद का दौर देखा तो कभी ट्रैजेडी किंग दिलीप कुमार का, कभी शो-मैन राज कपूर को देखा तो कभी रोमांस किंग राजेश खन्ना को, कभी एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन आये तो कभी किंग ख़ान शाहरुख़ को भी देखा। हर दौर में पिछले से कुछ अलग और नया दिखा मगर एक चीज़ जो कभी नहीं बदली वो थी दर्शकों की दीवानगी और कलाकार का अभिनय।
इन्हीं सौ सालों के पूरे होने के सम्मान में बॉम्बे टॉकीज़ फ़िल्म बनायी गयी है। बॉम्बे टॉकीज़ चार निर्देशकों की बनाई चार छोटी फ़िल्में हैं।

करण जौहरः करण की फ़िल्म समलैंगिकता के मुद्दे पर आधारित है। जहाँ एक बेटा (साक़िब असलम) अपने बाप से विद्रोह कर इसलिये घर छोड़ देता है क्योंकि उसका बाप ये बरदाश्त नहीं कर पाता कि उसका बेटा एक समलैंगिक है। वहीं दूसरी ओर एक न्यूज़ एंकर (रणदीप हुड्डा) समलैंगिक होने के बावजूद अपनी शादी-शुदा ज़िन्दगी को ज़बरदस्ती ढोने की कोशिश करता है लेकिन जब उसकी बीवी (रानी मुखर्जी) को पता लगता है तो वह उसे और ख़ुद को इस बंधन से आज़ाद करती है...हमारे इस समाज में पता नहीं कब लोग आज़ादी से खुलकर समलैंगिकता को अपनायेंगे और समलैंगिकों को भी समाज में बराबरी का दर्जा मिलेगा।

दिबाकर बनर्जीः दिवाकर ने सत्यजीत रे की कहानी पोतोल बाबू फ़िल्मस्टारपर अपनी फ़िल्म बनायी है। जो कि एक संघर्षरत एक्टर पुरंदर (नवाज़ुद्दिन सिद्दिक़ी) की ज़िन्दगी पर आधारित है। पुरंदर को ज़िन्दगी में बहुत कुछ चहिये। वो बिज़नेसमैन भी बनना चाहता है, एक सफल अभिनेता भी और उसे नौकरी भी करने की चाह है। उसकी आँखें तब खुलती हैं जब उसका बाप (सदाशिव अमरापुरकर) सपने में आकर उसे लताड़ता है और उसे उसकी कमियाँ गिनाता है। फ़िल्म के आख़िर के सीन में पुरंदर अपनी बेटी को कहानी सुनाता है जहाँ दर्शकों को कोई आवाज़ नहीं आती केवल फ़िल्म चलती है जिसे देखकर मूक फ़िल्मों का दौर याद आ जाता है। 

ज़ोया अख़्तरः सपने..सभी देखते हैं सपने, चाहे वो बूढ़ा हो, बच्चा हो या जवान मगर छुटपन में देखे सपनों में कोई लालच के भाव नहीं होते वो तो निश्छल भाव में दिल से देखे जाते हैं और उन सपनों को सच करने की चाह भी जुनूनी होती है। ज़ोया की कहानी एक बच्चे (नमन जैन) की ज़िन्दगी पर बनी है। जहाँ बाप (रणवीर शोरे) ज़बरदस्ती अपने मासूम से बच्चे को एक टफ़ मैनबनाने की चाहत में बच्चे के ख़ुद की चाहत भी नहीं पूछता। जबकि बच्चा कटरीना को शीला की जवानी डांस करते देख एक डांसर बनने का सपना देखता है। सपने और उनके संघर्ष के बीच की इस कहानी को ज़ोया ने बड़ी ही ख़ूबसूरती से पिरोया है।

अनुराग कश्यपः इलाहाबाद में एक बीमार बाप (सुधीर पाण्डे) अपने बेटे (विनीत कुमार सिंह) से गुहार लगाता है कि जिस तरह उसने अपने पिता जी को दिलीप कुमार की जूठी शहद खिलाई थी, जिसके बाद वो कई साल जीये थे ठीक उसी तरह उनका बेटा भी उन्हें अमिताभ बच्चन का जूठा मुरब्बा खिला दे तो शायद उनकी तबीयत के भी दिन बहुर जायें। पिता जी की इच्छा को पूरा करने बेटा घर से चल देता है मुम्बई! अनुराग की यह फ़िल्म दिखाती है हिंदी सिनेमा का असर। हिंदी सिनेमा का जुनून लोगों पर इस क़द्र है कि लोगों की आख़िरी इच्छा भी सिनेमा के इर्द-गिर्द ही घूमती नज़र आती है।

हिंदी सिनेमा के सौ सालों के सम्मान में बनी फ़िल्म बॉम्बे टॉकीज़ में भले ही कई लोगों की कोई एक पसंदीदा फ़िल्म हो पर सौ साल के सिनेमा के तोहफ़े के तौर पर बनी यह फ़िल्म शानदार है, और किसी एक निर्देशक की फ़िल्म को चुनना बड़ा ही मुश्किल जान पड़ता है।

P.S: "मेरा डायलॉग क्या है ?" ~ नवाज़ुद्दिन सिद्दिक़ी

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सोमवार, 13 मई 2013


आशिक़ी 2

जुलाई की गर्मी में सन् 1990 में जब महेश भट्ट की आशिक़ी परदे पर आयी तो गर्मी का वह मौसम भी कईयों के लिये ठंडक लेकर आया! रातों-रात फ़िल्म ने कई लोगों की ज़िन्दगियाँ बदल दीं। राहुल रॉय एक स्टार बन गये, नदीम-श्रवण और समीर की तिकड़ी को पहचान मिली, कुमार सानू ने एक सफल प्लेबैक सिंगर के तौर पर अपनी पहचान बनाई, फ़िल्म उस साल की एक बड़ी हिट साबित हुई और कई रिकार्ड्स भी टूटे।

     तेईस साल बाद जब मोहित सुरी ने आशिक़ी 2 बनाई तो फ़िल्म के ट्रेलर देख कर ही फ़िल्म का इंतज़ार किया जाने लगा। फ़िल्म के गाने भी हिट थे सो दर्शकों को फ़िल्म का और बेसब्री से इंतज़ार था। तो क्या फ़िल्म दर्शकों की कसौटी पर खरी उतरी ? जवाब है नहीं..बिल्कुल नहीं..और इसकी सबसे बड़ी वजह है फ़िल्म की कमज़ोर कहानी और उससे भी कमज़ोर अभिनय। आदित्य रॉय कपूर जो कि पहले कुछ फ़िल्मों जैसे – लण्डन ड्रीम्स, गुज़ारिश और एक्शन रिप्ले में बतौर सह-कलाकार काम कर चुके हैं फ़िल्म में लीड रोल में हैं। मगर उनका अभिनय इतना कमज़ोर है कि वह फ़िल्म को बचाता नहीं बल्कि डुबोता है।
     फ़िल्म शुरू होती है रॉकस्टार के तर्ज पर जिसे देखकर ऐसा लगता है कि निर्देशक मोहित सुरी किसी अंग्रेज़ी फ़िल्म की नकल करने के बजाय अपनी हिंदी फ़िल्मों की ही नकल करना पसंद करते हैं और उससे प्रेरित हैं! पुरानी आशिक़ी में प्रेमिका (अनु अग्रवाल) अपने प्रेमी (राहुल रॉय) को करियर में आगे बढ़ाती है और नयी आशिक़ी में ठीक इसके उलट प्रेमी (आदित्य रॉय कपूर) अपनी प्रेमिका (श्रद्धा कपूर) को आगे बढ़ाता है। मगर दिक्कत यह है कि पुरानी आशिक़ी में राहुल सिर्फ़ अनु का आशिक़ है और बस उसी की चाहत करता है मगर नयी आशिक़ी में राहुल जयकर (आदित्य रॉय कपूर) दो चीज़ों का आशिक़ है पहली शराब और दूसरी आरोही (श्रद्धा कपूर), शायद इसी वजह से फ़िल्म का नाम भी आशिक़ी 2 है!
आरोही तो राहुल को दिलो-जान से भी ज़्यादा प्यार करती है..राहुल भी उसे बेइंतहाँ चाहता है मगर राहुल अपनी पहली आशिक़ी यानी शराब को छोड़ नहीं पाता और नशे में डूबता चला जाता है। नाम, पैसा, शोहरत तो सभी कमाना चाहते हैं पर उसे सम्भाल कर रखना बहुत ही मुश्किल होता है ये हर किसी के बस की बात नहीं होती और कुछ ऐसा ही राहुल के साथ भी हुआ। मगर अपने प्यार को उसी बुलंदी पर पहुँचाकर राहुल ख़ुद को उसमें देखता है और इसी बहाने वो भी ख़ुश हो लेता है।

     बेदम अभिनय, कमज़ोर निर्देशन और ख़राब स्क्रिप्ट फ़िल्म को एक बोरियत भरी फ़िल्म बनाते हैं। जहाँ पुरानी आशिक़ी का निर्देशन ख़ुद महेश भट्ट ने किया था और कहानी, अभिनय, संगीत हर तरह से फ़िल्म मज़बूत थी। वहीं नयी आशिक़ी में संगीत छोड़ कुछ भी सराहने लायक नहीं है। जीत गांगुली, मिथुन और अंकित-अंकुर ने मिलकर नदीम-श्रवण की बराबरी करने की पूरी कोशिश की है मगर इसमे कोई दोमत नहीं है कि आशिक़ी में नदीम-श्रवण का संगीत बेजोड़ था। पुरानी आशिक़ी के सामने तो आशिक़ी 2 कहीं नहीं टिकती। श्रद्धा कपूर इस फ़िल्म में एकमात्र आकर्षण का केंद्र हैं। स्क्रीन पर आते ही उनके कुछ कहने से पहले उनकी आँखे ही बहुत कुछ बयाँ कर जाती हैं। सह-कलाकार के नाम पर फ़िल्म में महेश ठाकुर और शाद रंढावा ही हैं, जहाँ महेश ठाकुर ने अंकल जी का अच्छा अभिनय किया है। हैप्पी एंडिंग की आदत वाले दर्शकों को यह फ़िल्म और मायूस कर देगी!

P.S.: बेटे स्टार तो वही बन सकता है जिसकी आवाज़ सुनकर, जिसके गीत सुनकर दिल कहे सीटी मार..सीटी मार ~ अंकल जी (महेश ठाकुर) राहुल (आदित्य रॉय कपूर) से

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सोमवार, 25 मार्च 2013


माफ़ी या सज़ा: आज कल लोगों, न्यूज़ चैनलों और ख़बरों के बीच एक समान सा मुद्दा छाया हुआ है। मुद्दा है क्या संजय दत्त की साढ़े तीन साल की सज़ा माफ़ कर दी जाये ? कई राजनेता भी इसके पक्ष में हैं। उनका मानना है कि संजय दत्त सुधर चुके हैं और अब वह पहले वाले संजय दत्त नहीं रहे! जस्टिस काटजू भी संजय दत्त की सज़ा माफ़ करने के पक्ष में हैं, उनकी तो दलील भी अद्भुत है! उनका मानना है कि संजय दत्त ने अपनी फ़िल्मों के ज़रिये देश को गाँधी गिरीसिखायी है इसी बात पर उनकी सज़ा माफ़ कर दी जानी चाहिये!

एक स्टिंग में जहाँ ख़ुद संजय दत्त के वकील का यह मानना है कि जिस तरह का गुनाह दत्त ने किया है उसके मुक़ाबले उन्हें काफ़ी कम सज़ा मिली है। बकौल दत्त के वकील दत्त से छोटे स्तर क गुनाह करने वाले को भी उनसे ज़्यादा सज़ा मिल जाती है।

मगर दत्त पर इतनी मेहरबानी क्यों ? वो एक अभिनेता हैं, एक बड़ी शख़्सियत हैं, एक हीरो हैं सिर्फ़ इसलिये उनकी सज़ा माफ़ कर दी जाये यह तो कहीं से भी तर्क-संगत और न्याय-संगत नहीं है। फिर तो हर बड़ी हस्ती ख़ुद को क़ानून और न्याय व्यवस्था से ऊपर समझने लगेगी। जनता के बीच क्या संदेश जायेगा कि एक हीरो जो रील लाइफ़ में हीरो हैं उन्हें रीयल लाइफ़ में भी हीरो जैसा ट्रीटमेंट ही मिलता है। उन 257 मृतकों के परिवार वालों को क्या संदेश जायेगा जो 1993 बलास्ट में मारे गये थे। अगर संजय दत्त चाहते तो इस आतंकी गतिविधी की जानकारी पुलिस को दे सकते थे और शायद यह हादसा टल भी सकता था। अफ़सोस उन्होंने ऐसा नहीं किया..

सबसे हास्यास्पद तर्क तो यह है कि संजय दत्त अब सुधर चुके हैं! जब उन्होंने यह जुर्म किया था तब के संजय दत्त और आज के संजय दत्त में बहुत बदलाव आ चुका है! मतलब अगर कोई गुनाह करने के बाद सुधर जाये तो क्या इससे उसका गुनाह कम हो जाता है ? अगर गुनहगार सुधऱ भी जाये तो सज़ा कम होनी चाहिये ना कि सज़ा ही माफ़ कर दी जानी चाहिये। सुप्रीम कोर्ट ने संजय दत्त की सज़ा एक साल कम भी कर दी है मगर सज़ा माफ़ कर देना ग़लत होगा। यह न्याय और क़ानून का अपमान तो होगा ही लेकिन सबसे ग़लत होगा आम और ख़ास आदमी में किया जाने वाला भेदभाव।

बेहतर तो यही होगा कि संजय दत्त अपनी साढ़े तीन साल की सज़ा काटें ताकि जनता को भी ये संदेश जाये कि क़ानून की नज़र में सब बराबर हैं कोई आम नहीं है कोई ख़ास नहीं है।

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शनिवार, 16 मार्च 2013




दो तीन दिनों से दफ़तर के बाहर निकलने पर झा जी और गुप्ता जी की चाय पीने को नहीं मिल रही है। चाचा के पकौड़े और सोनू का पराठा भी खाने को नहीं मिल रहा है। तीन दिन पहले इन सभी और भी कई लोगों की नुक्कड़ और खोमचों पर लगने वाली दुकानें उजड़ी हुई मिलीं। कारण पूछने पर उन लोगों ने बताया अथॉरटी वाले आये थे उन्होंने ऐसा किया। उनका मतलब था कि अधिग्रहण कर प्रशासन ने उनकी दुकानें हटा दीं। कानून की नज़र से तो यह बिल्कुल सही काम है मगर मैं यह जानना चाहता हूँ कि उन सभी लोगों को बेरोज़गार करके क्या हासिल हुआ ? अगर वे बिना किसी की मदद के किसी को परेशान किये बिना अपनी रोज़ी रोटी चला रहे थे तो प्रशासन को इसमें क्या हर्ज था, उन्हें क्या आपत्ती थी ?  वहाँ जितने भी दफ़तर हैं किसी को भी कोई परेशानी महसूस नहीं हुई तो प्रशासन को कौन सी आफ़त आन पड़ी थी ?  इससे तो आप सिर्फ़ बेरोज़गारी और अपराध को ही बढ़ावा दे रहे है। बेरोज़गार ही आगे चल कर अपराध का रुख करते हैं, ये बात नहीं भूलनी चाहिये।

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गुरुवार, 14 मार्च 2013


एन्टी रेप लॉ बिल संसद में पास
लो भईया अब एन्टी रेप लॉ बिल पास हो गया है। किसी भी महिला को घूरने पर, उसका पीछा करने पर ग़ैर ज़मानती वॉरन्ट निकल जायेगा। और इन सभी केसों में लड़की का बयान आख़िरी होगा।
 तो सिर्फ़ घूरने पर ही क्यों देखने पर भी नियम बना दो, ग़लती से आँख मार दी तो उस पर भी वॉरन्ट निकाल दो। विडियोग्राफ़ी करने पर तो वॉरन्ट निकलेगा ही तस्वीर खींचने पर भी वॉरन्ट निकाल दो और अगर तस्वीर लड़की के मन मुताबिक़ ना आई हो तो उम्र क़ैद की सज़ा सुना दो।
बस, ट्रेन, मेट्रो आदि में सफ़र करते हुए अगर किसी महिला को धक्का लग जाए तो उसपर भी वॉरन्ट निकलना चाहिये। ग़लती से भी आप महिला आरक्षित सीट पर बैठ गये तब तो यह एक गुनाह है इस पर तो ग़ैर ज़मानती वॉरन्ट निकलना चाहिये।
आज कल तो सोशल नेटवर्किंग साइट का ज़माना है तो इसे कैसे छोड़ सकते हैं। इस पर भी नकेल कस दी जाए। अन्जान लड़की को फ़ेसबुक पर फ़्रेन्ड रिक्वेस्ट भेजने पर भी वॉरन्ट निकलना चाहिये। लड़की के अपडेट्स पर लाइक और अच्छी कमेंट ना करने पर तो उम्रकैद हो जानी चाहिये। बिना पूछे टैग करने पर भी वॉरन्ट निकलना चाहिये। ना जाने किस टैग को लेकर लड़की की भावनाओं को ठेस पहुँच जाए।
लड़की पर ग़ुस्सा दिखाने पर भी कानून बनना चाहिये और ग़ुस्सा किस लेवल तक का मान्य होगा इसका भी कानून बनना चाहिये और अगर यह बिल्कुल अमान्य है तो इस पर भी कानून होना चाहिये और वॉरन्ट तो ज़रूर निकलना चाहिये।
अब ग़लती से भी अगर कोई लड़की आपके आगे चलती है श्रीमान तो आपके नाम का ग़ैर ज़मानती वॉरन्ट निकल जायेगा तो कभी भी किसी लड़की के पीछे ना चलें हाँ आगे चलते हुए पीछे मुड़कर देखने पर क्या होगा इस पर अब तक कोई कानून नहीं बना लेकिन इसपर भी कानून बनाना चाहिये और वॉरन्ट तो ज़रूर निकलना चाहिये। अगर बराबर में चलते हैं तो ? मेरे ख़याल से इस पर भी कानून बनाकर वॉरन्ट निकाल देना चाहिये। अब तो सीढ़ियाँ चढ़ते और उतरते वक्त भी ख़ासा ध्यान देना होगा ग़लती से भी अगर कोई लड़की आगे हुई तो एन्टी रेप लॉ के तहत पीछा करने की शिकायत दर्ज करा कर ग़ैर ज़मानती वॉरन्ट ना निकलवा दे। इस कानून पर थ्री इडियट्स फ़िल्म का एक डायलॉग याद आता है जिसे अब बदलकर कुछ यूँ कहना चाहिये लाइफ़ इज ए रेस अगर तुम आगे नहीं चलोगे और कोई लड़की तुमसे आगे निकल गयी तो तुम्हारे नाम का ग़ैर जमानती वॉरन्ट निकल जायेगा।
अगर आप लेडीज़ फ़स्ट के जुमले को नहीं अपनाते तब तो वॉरन्ट ज़रूर निकलना चाहिये और वो भी ग़ैर ज़मानती। इसमें लड़की को आगे ना आने देने का केस बनना चाहिये और सख़्त से सख़्त सज़ा का प्रावधान होना चाहिये और अगर उम्र क़ैद हो जाए तो क्या कहने। लड़की को कहीं बाहर ले जाने या कॉफी पीने के प्रस्ताव को भी गम्भीरता से लिया जाना चाहिये और अगर लड़की प्रस्ताव ठुकराती है तो ग़ैर ज़मानती वॉरन्ट निकलना चाहिये।
आख़िर आपने लड़की को इगनॉर करने या चेप होने की हिमाकत की कैसे? इसलिये लड़की को देखकर मुस्कराने, कॉम्प्लिमेंट देने और कॉम्प्लिमेंट ना देने पर भी वॉरन्ट निकलना चाहिये और इस बाबत सज़ा क्या हो ये लड़की ख़ुद तय करे मगर सज़ा सख़्त ज़रूर होनी चाहिये। अब तो मज़ाक भी बचकर करना होगा कहीं लड़की उस मज़ाक को छींटाकशी का नाम देकर वॉरन्ट ना निकलवा दे।

फ़न्डा तो बस ये है कि ये जितने भी कानून बन रहे हैं यह तो सिर्फ़ पुलिस को घूस बटोरने के लिये नये रास्ते बनाये जा रहे हैं और कुछ नहीं। आख़िर घूरने और पीछा करने को आप कैसे माँपेंगे ज़रा बताइये। अगर किसी महिला को देखकर मुझे मेरी किसी जान पहचान वाले से मिलती जुलती शक़्ल लगे और मैं उसके चेहरे को देखते हुए याद करने की कोशिश करूँ तो ? यह तो घूरने की श्रेणी में आ जायेगा। इन चीज़ों को साबित करना मुश़्किल ही नहीं नामुमकिन होगा।

P.S. : ऊपर लिखे गये विचार मैंने केवल इस कानून की कमज़ोरियाँ दिखाने हेतु लिखे हैं। मेरा मक़सद किसी को भी ठेस पहुँचाना नहीं है और ना ही किसी महिला से मेरी दुश्मनी या बैर है..धन्यवाद!

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