सोमवार, 25 मार्च 2013


माफ़ी या सज़ा: आज कल लोगों, न्यूज़ चैनलों और ख़बरों के बीच एक समान सा मुद्दा छाया हुआ है। मुद्दा है क्या संजय दत्त की साढ़े तीन साल की सज़ा माफ़ कर दी जाये ? कई राजनेता भी इसके पक्ष में हैं। उनका मानना है कि संजय दत्त सुधर चुके हैं और अब वह पहले वाले संजय दत्त नहीं रहे! जस्टिस काटजू भी संजय दत्त की सज़ा माफ़ करने के पक्ष में हैं, उनकी तो दलील भी अद्भुत है! उनका मानना है कि संजय दत्त ने अपनी फ़िल्मों के ज़रिये देश को गाँधी गिरीसिखायी है इसी बात पर उनकी सज़ा माफ़ कर दी जानी चाहिये!

एक स्टिंग में जहाँ ख़ुद संजय दत्त के वकील का यह मानना है कि जिस तरह का गुनाह दत्त ने किया है उसके मुक़ाबले उन्हें काफ़ी कम सज़ा मिली है। बकौल दत्त के वकील दत्त से छोटे स्तर क गुनाह करने वाले को भी उनसे ज़्यादा सज़ा मिल जाती है।

मगर दत्त पर इतनी मेहरबानी क्यों ? वो एक अभिनेता हैं, एक बड़ी शख़्सियत हैं, एक हीरो हैं सिर्फ़ इसलिये उनकी सज़ा माफ़ कर दी जाये यह तो कहीं से भी तर्क-संगत और न्याय-संगत नहीं है। फिर तो हर बड़ी हस्ती ख़ुद को क़ानून और न्याय व्यवस्था से ऊपर समझने लगेगी। जनता के बीच क्या संदेश जायेगा कि एक हीरो जो रील लाइफ़ में हीरो हैं उन्हें रीयल लाइफ़ में भी हीरो जैसा ट्रीटमेंट ही मिलता है। उन 257 मृतकों के परिवार वालों को क्या संदेश जायेगा जो 1993 बलास्ट में मारे गये थे। अगर संजय दत्त चाहते तो इस आतंकी गतिविधी की जानकारी पुलिस को दे सकते थे और शायद यह हादसा टल भी सकता था। अफ़सोस उन्होंने ऐसा नहीं किया..

सबसे हास्यास्पद तर्क तो यह है कि संजय दत्त अब सुधर चुके हैं! जब उन्होंने यह जुर्म किया था तब के संजय दत्त और आज के संजय दत्त में बहुत बदलाव आ चुका है! मतलब अगर कोई गुनाह करने के बाद सुधर जाये तो क्या इससे उसका गुनाह कम हो जाता है ? अगर गुनहगार सुधऱ भी जाये तो सज़ा कम होनी चाहिये ना कि सज़ा ही माफ़ कर दी जानी चाहिये। सुप्रीम कोर्ट ने संजय दत्त की सज़ा एक साल कम भी कर दी है मगर सज़ा माफ़ कर देना ग़लत होगा। यह न्याय और क़ानून का अपमान तो होगा ही लेकिन सबसे ग़लत होगा आम और ख़ास आदमी में किया जाने वाला भेदभाव।

बेहतर तो यही होगा कि संजय दत्त अपनी साढ़े तीन साल की सज़ा काटें ताकि जनता को भी ये संदेश जाये कि क़ानून की नज़र में सब बराबर हैं कोई आम नहीं है कोई ख़ास नहीं है।

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शनिवार, 16 मार्च 2013




दो तीन दिनों से दफ़तर के बाहर निकलने पर झा जी और गुप्ता जी की चाय पीने को नहीं मिल रही है। चाचा के पकौड़े और सोनू का पराठा भी खाने को नहीं मिल रहा है। तीन दिन पहले इन सभी और भी कई लोगों की नुक्कड़ और खोमचों पर लगने वाली दुकानें उजड़ी हुई मिलीं। कारण पूछने पर उन लोगों ने बताया अथॉरटी वाले आये थे उन्होंने ऐसा किया। उनका मतलब था कि अधिग्रहण कर प्रशासन ने उनकी दुकानें हटा दीं। कानून की नज़र से तो यह बिल्कुल सही काम है मगर मैं यह जानना चाहता हूँ कि उन सभी लोगों को बेरोज़गार करके क्या हासिल हुआ ? अगर वे बिना किसी की मदद के किसी को परेशान किये बिना अपनी रोज़ी रोटी चला रहे थे तो प्रशासन को इसमें क्या हर्ज था, उन्हें क्या आपत्ती थी ?  वहाँ जितने भी दफ़तर हैं किसी को भी कोई परेशानी महसूस नहीं हुई तो प्रशासन को कौन सी आफ़त आन पड़ी थी ?  इससे तो आप सिर्फ़ बेरोज़गारी और अपराध को ही बढ़ावा दे रहे है। बेरोज़गार ही आगे चल कर अपराध का रुख करते हैं, ये बात नहीं भूलनी चाहिये।

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गुरुवार, 14 मार्च 2013


एन्टी रेप लॉ बिल संसद में पास
लो भईया अब एन्टी रेप लॉ बिल पास हो गया है। किसी भी महिला को घूरने पर, उसका पीछा करने पर ग़ैर ज़मानती वॉरन्ट निकल जायेगा। और इन सभी केसों में लड़की का बयान आख़िरी होगा।
 तो सिर्फ़ घूरने पर ही क्यों देखने पर भी नियम बना दो, ग़लती से आँख मार दी तो उस पर भी वॉरन्ट निकाल दो। विडियोग्राफ़ी करने पर तो वॉरन्ट निकलेगा ही तस्वीर खींचने पर भी वॉरन्ट निकाल दो और अगर तस्वीर लड़की के मन मुताबिक़ ना आई हो तो उम्र क़ैद की सज़ा सुना दो।
बस, ट्रेन, मेट्रो आदि में सफ़र करते हुए अगर किसी महिला को धक्का लग जाए तो उसपर भी वॉरन्ट निकलना चाहिये। ग़लती से भी आप महिला आरक्षित सीट पर बैठ गये तब तो यह एक गुनाह है इस पर तो ग़ैर ज़मानती वॉरन्ट निकलना चाहिये।
आज कल तो सोशल नेटवर्किंग साइट का ज़माना है तो इसे कैसे छोड़ सकते हैं। इस पर भी नकेल कस दी जाए। अन्जान लड़की को फ़ेसबुक पर फ़्रेन्ड रिक्वेस्ट भेजने पर भी वॉरन्ट निकलना चाहिये। लड़की के अपडेट्स पर लाइक और अच्छी कमेंट ना करने पर तो उम्रकैद हो जानी चाहिये। बिना पूछे टैग करने पर भी वॉरन्ट निकलना चाहिये। ना जाने किस टैग को लेकर लड़की की भावनाओं को ठेस पहुँच जाए।
लड़की पर ग़ुस्सा दिखाने पर भी कानून बनना चाहिये और ग़ुस्सा किस लेवल तक का मान्य होगा इसका भी कानून बनना चाहिये और अगर यह बिल्कुल अमान्य है तो इस पर भी कानून होना चाहिये और वॉरन्ट तो ज़रूर निकलना चाहिये।
अब ग़लती से भी अगर कोई लड़की आपके आगे चलती है श्रीमान तो आपके नाम का ग़ैर ज़मानती वॉरन्ट निकल जायेगा तो कभी भी किसी लड़की के पीछे ना चलें हाँ आगे चलते हुए पीछे मुड़कर देखने पर क्या होगा इस पर अब तक कोई कानून नहीं बना लेकिन इसपर भी कानून बनाना चाहिये और वॉरन्ट तो ज़रूर निकलना चाहिये। अगर बराबर में चलते हैं तो ? मेरे ख़याल से इस पर भी कानून बनाकर वॉरन्ट निकाल देना चाहिये। अब तो सीढ़ियाँ चढ़ते और उतरते वक्त भी ख़ासा ध्यान देना होगा ग़लती से भी अगर कोई लड़की आगे हुई तो एन्टी रेप लॉ के तहत पीछा करने की शिकायत दर्ज करा कर ग़ैर ज़मानती वॉरन्ट ना निकलवा दे। इस कानून पर थ्री इडियट्स फ़िल्म का एक डायलॉग याद आता है जिसे अब बदलकर कुछ यूँ कहना चाहिये लाइफ़ इज ए रेस अगर तुम आगे नहीं चलोगे और कोई लड़की तुमसे आगे निकल गयी तो तुम्हारे नाम का ग़ैर जमानती वॉरन्ट निकल जायेगा।
अगर आप लेडीज़ फ़स्ट के जुमले को नहीं अपनाते तब तो वॉरन्ट ज़रूर निकलना चाहिये और वो भी ग़ैर ज़मानती। इसमें लड़की को आगे ना आने देने का केस बनना चाहिये और सख़्त से सख़्त सज़ा का प्रावधान होना चाहिये और अगर उम्र क़ैद हो जाए तो क्या कहने। लड़की को कहीं बाहर ले जाने या कॉफी पीने के प्रस्ताव को भी गम्भीरता से लिया जाना चाहिये और अगर लड़की प्रस्ताव ठुकराती है तो ग़ैर ज़मानती वॉरन्ट निकलना चाहिये।
आख़िर आपने लड़की को इगनॉर करने या चेप होने की हिमाकत की कैसे? इसलिये लड़की को देखकर मुस्कराने, कॉम्प्लिमेंट देने और कॉम्प्लिमेंट ना देने पर भी वॉरन्ट निकलना चाहिये और इस बाबत सज़ा क्या हो ये लड़की ख़ुद तय करे मगर सज़ा सख़्त ज़रूर होनी चाहिये। अब तो मज़ाक भी बचकर करना होगा कहीं लड़की उस मज़ाक को छींटाकशी का नाम देकर वॉरन्ट ना निकलवा दे।

फ़न्डा तो बस ये है कि ये जितने भी कानून बन रहे हैं यह तो सिर्फ़ पुलिस को घूस बटोरने के लिये नये रास्ते बनाये जा रहे हैं और कुछ नहीं। आख़िर घूरने और पीछा करने को आप कैसे माँपेंगे ज़रा बताइये। अगर किसी महिला को देखकर मुझे मेरी किसी जान पहचान वाले से मिलती जुलती शक़्ल लगे और मैं उसके चेहरे को देखते हुए याद करने की कोशिश करूँ तो ? यह तो घूरने की श्रेणी में आ जायेगा। इन चीज़ों को साबित करना मुश़्किल ही नहीं नामुमकिन होगा।

P.S. : ऊपर लिखे गये विचार मैंने केवल इस कानून की कमज़ोरियाँ दिखाने हेतु लिखे हैं। मेरा मक़सद किसी को भी ठेस पहुँचाना नहीं है और ना ही किसी महिला से मेरी दुश्मनी या बैर है..धन्यवाद!

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मंगलवार, 12 मार्च 2013


साहेब बीवी और गैंगस्टर रिटर्नस
चोर चोरी करना छोड़ दे पर हेरा-फेरी से बाज़ नहीं आता..शिकारी शिकार करना छोड़ दे पर वो शिकार करना नहीं भूलता..ठीक उसी तरह एक राजा का भले ही रजवाड़ा ख़त्म हो जाए, भले उसका दरबार ना सजे, उसकी शान-ओ-शौकत चली जाए पर राजशाही फ़ितरत उससे दूर नहीं जाती क्योंकि यह उनके ख़ून में बसती है। ऐसे ही दो राजाओं की कहानी है तिग्मांशु धुलिया की नयी फ़िल्म साहेब बीवी और गैंगस्टर रिटर्नस..एक जो अपने दिमाग़ और ज़िद से राजा बनना चाहता था तो दूसरा पहले को गिराकर ख़ुद राजा बनना चाहता था।
कहानी तो पिछली साहेब बीवी और गैंगस्टर के आगे से ही शुरू होती है। साहेब (जिम्मी शेरगिल्ल) और बीवी (माही गिल्ल) तो वही हैं मगर गैगस्टर (इरफ़ान ख़ान) इस बार नया है। साहेब भी नयी बीवी(सोहा अली ख़ान) लाने की पूरी तैयारी में हैं। पिछली साहेब बीवी और गैंगस्टर में तो बीवी ने गैंगस्टर को तैयार करके मोहरा बनाया था साहेब उर्फ आदित्य प्रताप सिंह का साम्राज्य हथियाने के लिये। मगर इस बार तो इंद्रजीत सिंह (गैंगस्टर) ने ही बीवी को मोहरा बना लिया अपना पुश्तैनी बदला साहेब से लेने के लिये। पर साहेब जो कि व्हील चेयर पर रहता है, इतनी आसानी से हार मानने वालों में से कहाँ था और होता भी क्यों ना आख़िर राजा जो था, उसकी ठसक आज भी वैसी ही थी..रस्सी जलके के बाद भी बल अब तलक ना गया था। कहानी तब मोड़ लेती है जब साहेब अपना दिल इंद्रजीत की प्रेमिका रंजना (सोहा अली ख़ान) पर हार जाते हैं और साम, दाम, दण्ड भेद सब लगा कर रंजना को अपनी नयी बीवी बनाने की कोशिश करते हैं और इस कोशिश में सफल भी होते हैं मगर बदले की आग में जल रहा इंद्रजीत जब बाज़ी हाथ से निकलते हुए देखता है तब अपना आख़िरी दाँव चलता है और जान देकर भी जीत जाता है..और उसे जिताने में माधवी (माही गिल्ल) उसका पूरा साथ देती है क्योंकि उसे साहेब का साम्राज्य जो हथियाना था। हर किसी को कुछ ना कुछ हासिल हुआ- साहेब को हार, माधवी को साहेब का साम्राज्य, इंद्रजीत को जीत बस तनहा रह गयी बेचारी नयी बीवी रंजना।
तिग्मांशु धुलिया और कमल पांडेय ने बड़ी ही दिलचस्प कहानी लिखी है, जो दर्शकों को अंत तक बाँधे रखती है और रोमांच भी अंत तक बना रहता है। हर दूसरे सीन में किरदार कोई ऐसा डायलॉग कहता है जिसपर आप वाह-वाह कर उठेंगे- चाँद पर बाद में जाना ज़माने वालों पहले धरती पर तो रहना सीख लो, डर तो हमेशा लगा रहता है कहीं ये पिस्तौल भी आपकी तरह बेशर्म ना हो जाए, हमें हमेशा मर्द क्यों मिलते हैं शायर क्यों नहीं मिलते... सधा स्क्रीनप्ले, दमदार निर्देशन और चुस्त कहानी फ़िल्म को पूरी तरह से सफल बनाते हैं। जिम्मी शेरगिल्ल और इरफ़ान ख़ान तो अपनी हर फ़िल्म के साथ बेहतर होते जा रहे हैं। सपोर्टिंग रोल में रंजना के पिता की भूमिका में राज बब्बर और इंद्रजीत के भाई के तौर पर प्रवेश राणा ने अच्छी एक्टिंग की है। खासकर प्रवेश को तो देखकर लगा ही नहीं कि यह उनकी पहली फ़िल्म है। तिग्मांशु धुलिया के सफल प्रयास के कारण एक बेहतरीन फ़िल्म देखने को मिली तिग्मांशु दर्शकों की उम्मीद पर खरे उतरे हैं।


P.S: “आपको पता है हम मर्द ज़्यादा गालियाँ क्यों देते हैं ? क्योंकि वो रोते कम हैं” - साहेब उर्फ़ आदित्य प्रताप सिंह रंजना से


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सोमवार, 11 मार्च 2013


काइ पो चे: क्रिकेट, दोस्ती और सपनों की उड़ान

क्रिकेट एक विदेशी खेल होते हुए भी हमारे देश भारत में इतना लोकप्रिय है कि यह किसी मज़हब से कम नहीं है। ये एक ऐसा ज़रिया है जो दो अंजान लोगों को भी आपस में जोड़ता है। दोस्ती, प्यार और भाईचारा बढ़ाता है। इस खेल की ख़ुमारी ही कुछ ऐसी है कि लोग भावनाओं में इस क़द्र बह जाते हैं कि जात-पात, ऊँच-नीच, अमीर-ग़रीब कुछ भी नहीं देखते, बस खेल में रम जाते हैं और जीत का जश्न भी पूरे जोश के साथ सब मिलकर मनाते हैं।

      फ़िल्म काइ पो चे भी क्रिकेट, दोस्ती, दोस्तों के सपने और हमारे समाज कि दकियानूसी सोच को दर्शाती है। तीन दोस्त- इशान, गोविंद पटेल और ओमकार शास्त्री उर्फ़ ओमी अपने सपनों को पूरा करने की ख़ातिर जी जान लगा देते हैं, ज़िन्दगी में आगे जाने के लिये कड़ी मेहनत करते हैं। इस काज में उनकी मदद करता है ओमी का स्वार्थी और लालची मामा बिट्टू जोशी। मदद करने के पीछे बिट्टू जोशी की केवल एक मंशा है कि ओमी और उसके पिता जी जो कि इलाके के पुराने मंदिर के मुख्य स्वामी हैं बिट्टू जोशी की पार्टी से जुड़ जाएँ ताकि बिट्टू जोशी का वोट बैंक बढ़ सके। अपने स्वार्थ के लिये बिट्टू जोशी शकुनि मामा का रोल अदा करते हैं। बिट्टू जोशी एक बारगी नहीं सोचते कि एक हँसता खेलता, अपनी दुनिया में मस्त युवा लड़के को मजबूर करना कि वह पार्टी में आकर एक ज़िम्मेदार कार्यकर्ता का हक़ अदा करे।

      क्या गुज़रेगी आप पर जब आपकी आखों के सामने आपका सपना चूर-चूर हो जाये और आप सिवाय ताकने के कुछ और ना कर सकें। कुछ ऐसा ही होता है जब भूकंप के कारण तीनों दोस्तों का मॉल में दुकान खोलने का सपना भी ढह जाता है। देखने और सोचने में यह बड़ा ही मज़ाकिया लगे कि एक तरफ़ तो भूकंप में गोविंद का घर-बार बर्बाद हो गया पर गोविंद घर की चिंता छोड़ मॉल को देखने दौड़ता है जिसमें तीनों ने नयी दुकान बुक कराई है कि कहीं मॉल भी भूकंप की चपेट में ना आ गया हो। उसके दिल में ख़ौफ़ है और उसे अनुमान भी है कि ऐसे बड़े भूकंप में मॉल शायद ही बचे पर वो उसी भूकंप में बचता हुआ अपनी जान पर खेलकर मॉल की अपनी दुकान देखने जाता है क्योंकि यह उसका सपना है। और अपने सपने को हक़ीक़त में बदलने की ख़ातिर आप कुछ भी कर गुज़रने की चाहत रखते हैं, यही गोविंद ने भी किया।

      भूकंप के बाद हुई तबाही में जहाँ हर किसी को जाति और मज़हब भूलकर लोगों कि मदद करनी चाहिये वहाँ इशान जो कि जाति और मज़हब की सोच से परे है, अपनी क्रिकेट अकादमी में खेलने वाले होनहार बच्चे अली और उसके परिवार को बिट्टू जोशी और उसकी पार्टी की ओर से दिये जा रहे सहायता कैंप में मदद के लिये ल कर जाता है पर उन्हें वहाँ से मात्र इसलिये दुत्कार दिया जाता है क्योंकि अली का परिवार मुसलमान है। दलील यह दी जाती है कि कैंप में सिर्फ हिंदू परिवारों को सहायता दी जायेगी क्योंकि ये उनके लोग नहीं है! ये बात दिल को कचोटती है कि हमारे समाज से ये मज़हबी बैर कब ख़त्म होगा। कब हम मज़हबी सोच से ऊपर उठकर इंसानियत को पहचानेंगे और अपनायेंगे, आख़िर कब ? और यह सिलसिला यहीं नहीं रुकता हालात बद से बदतर हो जाते हैं जब गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस की दो बोगियों में आग लगा दी जाती है और इस कुकृत्य से हिंदू भड़क जाते हैं और मुसलमानों के ख़ून के प्यासे हो जाते हैं।

      इशान की क्रिकेट अकादमी का सबसे होनहार बच्चा अली भी कहीं इस दंगे का शिकार ना हो जाये इसलिये इशान उसे बचाने की कोशिश में उसके घर ही रुक जाता है। इशान जो कि अपने देश भारत को अली के रूप में एक होनहार क्रिकेटर देना चाहता है यह नहीं जानता कि मौत उसका इंतज़ार कर रही है। बिट्टू जोशी, ओमी और उनके आदमी अली के घर पर हमला कर देते हैं। ओमी के सिर पर अपने माँ-बाप की ट्रेन में जलकर हुई मौत का बदला लेने की सनक सवार रहती है और वह अली के बाप को गोली मारने की क़वाइद में अपने ही दोस्त इशान को गोली मार देता है....अगर मज़हबी बैर ना होता तो ओमी शायद अपने दोस्त इशान को नहीं खोता।

बावजूद इसके कि ओमी ने इशान की हत्या की है गोविंद ओमी को जेल से निकलने के बाद लेने जाता है और सब कुछ भुला कर उसे अपना लेता है। ऐसे ही होते हैं दोस्त जो आपकी हर ग़लती और बुराई को भूलकर आपको अपनाते हैं। जिनके साथ आप ख़ुद को ख़ुश और महफ़ूज़ पाते हैं।

चेतन भगत के उपन्यास थ्री मिस्टेक्स ऑफ़ माई लाइफ़ पर बनी फ़िल्म काइ पो चे पूरी तरह से उपन्यास की कहानी को समेटे हुए है। अगर आपने उपन्यास ना भी पढ़ा हो तो आपको लगेगा कि आपने फ़िल्म देखने के बाद उसे पढ़ लिया है। इसका श्रेय स्क्रीनप्ले लेखक पुबाली चौधरी, सुप्रतीक सेन, चेतन भगत और निर्देशक अभिषेक कपूर को जाता है। रॉक ऑन फ़ेम अभिषेक कपूर दोस्ती को इस ख़ूबसूरत तरीके से परदे पर उतारते हैं कि वह देखते ही बनता है। ये लगता ही नहीं कि इशान की भूमिका निभा रहे सुशांत सिंह राजपूत की यह पहली फ़िल्म है। सुशांत ने एक एंगरी यंग मैन का रोल बख़ूबी अदा किया है जो देखने लायक है। सह कलाकार की भूमिका में राजकुमार यादव (गोविंद) अपनी हर फ़िल्म के साथ मँझते जा रहे हैं। अमित साढ ने ओमी का किरदार बख़ूबी निभाया है। फ़िल्म आएशा से अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत करने वाली एक मात्र महिला कलाकार अमृता पूरी ने फ़िल्म में इशान की बहन और गोविंद की प्रेमिका विद्दा के तौर पर एक मॉडर्न लड़की का अभिनय किया है। अमित त्रिवेदी का संगीत बेहतरीन है ख़ासकर के मांजा गाना तो ज़बाँ पर चढ़ जाता है।

दोस्ती और क्रिकेट हिंदी सिनेमा का हिट फ़ॉर्मुला है, और काइ पो चे में तो ये दोनों ही चीज़ों मौजूद हैं उपर से कहानी चेतन भगत की है जो फ़िल्म में चार चाँद लगा देती है। अभिषेक कपूर ने फिर से यह दिखा दिया है कि नये कलाकारों पर भी भरोसा करके फ़िल्म बनायी जा सकती है।

P.S: रूठे ख़्वाबों को मना लेंगे, कटी पतंगों को थामेंगे, हाँ हाँ है जज़्बा
    सुलझा लेंगे उलझे रिश्तों का मांझा..मांझा..मांझा ~ lines from the song Manjha


image courtesy ~ india-forums.com