काइ पो चे: क्रिकेट,
दोस्ती और सपनों की उड़ान
क्रिकेट एक विदेशी खेल होते
हुए भी हमारे देश भारत में इतना लोकप्रिय है कि यह किसी मज़हब से कम नहीं
है। ये एक ऐसा ज़रिया है जो दो अंजान लोगों को भी आपस में जोड़ता है। दोस्ती,
प्यार और भाईचारा बढ़ाता है। इस खेल की ख़ुमारी ही कुछ ऐसी है कि लोग भावनाओं में
इस क़द्र बह जाते हैं कि जात-पात, ऊँच-नीच, अमीर-ग़रीब कुछ भी नहीं देखते, बस खेल
में रम जाते हैं और जीत का जश्न भी पूरे जोश के साथ सब मिलकर मनाते हैं।
फ़िल्म
काइ पो चे भी क्रिकेट, दोस्ती, दोस्तों के सपने और हमारे समाज कि दकियानूसी सोच को
दर्शाती है। तीन दोस्त- इशान, गोविंद पटेल और ओमकार शास्त्री उर्फ़ ओमी अपने सपनों
को पूरा करने की ख़ातिर जी जान लगा देते हैं, ज़िन्दगी में आगे जाने के लिये कड़ी
मेहनत करते हैं। इस काज में उनकी मदद करता है ओमी का स्वार्थी और लालची मामा बिट्टू
जोशी। मदद करने के पीछे बिट्टू जोशी की केवल एक मंशा है कि ओमी और उसके
पिता जी जो कि इलाके के पुराने मंदिर के मुख्य स्वामी हैं बिट्टू जोशी की पार्टी
से जुड़ जाएँ ताकि बिट्टू जोशी का वोट बैंक बढ़ सके। अपने स्वार्थ के लिये बिट्टू
जोशी शकुनि मामा का रोल अदा करते हैं। बिट्टू जोशी एक बारगी नहीं सोचते कि एक
हँसता खेलता, अपनी दुनिया में मस्त युवा लड़के को मजबूर करना कि वह पार्टी में आकर
एक ज़िम्मेदार कार्यकर्ता का हक़ अदा करे।
क्या गुज़रेगी आप पर जब आपकी आखों के सामने आपका सपना
चूर-चूर हो जाये और आप सिवाय ताकने के कुछ और ना कर सकें। कुछ ऐसा ही होता है जब
भूकंप के कारण तीनों दोस्तों का मॉल में दुकान खोलने का सपना भी ढह जाता है। देखने
और सोचने में यह बड़ा ही मज़ाकिया लगे कि एक तरफ़ तो भूकंप में गोविंद का घर-बार
बर्बाद हो गया पर गोविंद घर की चिंता छोड़ मॉल को देखने दौड़ता है जिसमें तीनों ने
नयी दुकान बुक कराई है कि कहीं मॉल भी भूकंप की चपेट में ना आ गया हो। उसके दिल
में ख़ौफ़ है और उसे अनुमान भी है कि ऐसे बड़े भूकंप में मॉल शायद ही बचे पर वो
उसी भूकंप में बचता हुआ अपनी जान पर खेलकर मॉल की अपनी दुकान देखने जाता है
क्योंकि यह उसका सपना है। और अपने सपने को हक़ीक़त में बदलने की ख़ातिर आप कुछ भी
कर गुज़रने की चाहत रखते हैं, यही गोविंद ने भी किया।
भूकंप
के बाद हुई तबाही में जहाँ हर किसी को जाति और मज़हब भूलकर लोगों कि मदद करनी
चाहिये वहाँ इशान जो कि जाति और मज़हब की सोच से परे है, अपनी क्रिकेट अकादमी में
खेलने वाले होनहार बच्चे अली और उसके परिवार को बिट्टू जोशी और उसकी पार्टी की ओर
से दिये जा रहे सहायता कैंप में मदद के लिये ल कर जाता है पर उन्हें वहाँ से मात्र
इसलिये दुत्कार दिया जाता है क्योंकि अली का परिवार मुसलमान है। दलील यह दी जाती
है कि कैंप में सिर्फ हिंदू परिवारों को सहायता दी जायेगी क्योंकि ये उनके लोग
नहीं है! ये
बात दिल को कचोटती है कि हमारे समाज से ये मज़हबी बैर कब ख़त्म होगा। कब हम मज़हबी
सोच से ऊपर उठकर इंसानियत को पहचानेंगे और अपनायेंगे, आख़िर कब ? और यह सिलसिला यहीं
नहीं रुकता हालात बद से बदतर हो जाते हैं जब गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस की दो
बोगियों में आग लगा दी जाती है और इस कुकृत्य से हिंदू भड़क जाते हैं और मुसलमानों
के ख़ून के प्यासे हो जाते हैं।
इशान की क्रिकेट अकादमी का सबसे होनहार बच्चा अली भी कहीं इस दंगे
का शिकार ना हो जाये इसलिये इशान उसे बचाने की कोशिश में उसके घर ही रुक जाता है।
इशान जो कि अपने देश भारत को अली के रूप में एक होनहार क्रिकेटर देना चाहता है यह
नहीं जानता कि मौत उसका इंतज़ार कर रही है। बिट्टू
जोशी, ओमी और उनके आदमी अली के घर पर हमला कर देते हैं। ओमी के सिर पर अपने
माँ-बाप की ट्रेन में जलकर हुई मौत का बदला लेने की सनक सवार रहती है और वह अली के
बाप को गोली मारने की क़वाइद में अपने ही दोस्त इशान को गोली मार देता है....अगर
मज़हबी बैर ना होता तो ओमी शायद अपने दोस्त इशान को नहीं खोता।
बावजूद इसके कि ओमी ने इशान की
हत्या की है गोविंद ओमी को जेल से निकलने के बाद लेने जाता है और सब कुछ भुला कर
उसे अपना लेता है। ऐसे ही होते हैं दोस्त जो आपकी हर ग़लती और बुराई को भूलकर आपको
अपनाते हैं। जिनके साथ आप ख़ुद को ख़ुश और महफ़ूज़ पाते हैं।
चेतन भगत के उपन्यास ‘थ्री मिस्टेक्स ऑफ़ माई
लाइफ़’ पर
बनी फ़िल्म काइ पो चे पूरी तरह से उपन्यास की कहानी को समेटे हुए है। अगर आपने
उपन्यास ना भी पढ़ा हो तो आपको लगेगा कि आपने फ़िल्म देखने के बाद उसे पढ़ लिया
है। इसका श्रेय स्क्रीनप्ले लेखक पुबाली चौधरी, सुप्रतीक सेन, चेतन भगत और
निर्देशक अभिषेक कपूर को जाता है। रॉक ऑन फ़ेम अभिषेक कपूर दोस्ती को इस ख़ूबसूरत
तरीके से परदे पर उतारते हैं कि वह देखते ही बनता है। ये लगता ही नहीं कि इशान की
भूमिका निभा रहे सुशांत सिंह राजपूत की यह पहली फ़िल्म है। सुशांत ने एक एंगरी यंग मैन का रोल बख़ूबी
अदा किया है जो देखने लायक है। सह कलाकार की भूमिका में राजकुमार यादव (गोविंद)
अपनी हर फ़िल्म के साथ मँझते जा रहे हैं। अमित साढ ने ओमी का किरदार बख़ूबी निभाया
है। फ़िल्म आएशा से अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत करने वाली एक मात्र महिला कलाकार
अमृता पूरी ने फ़िल्म में इशान की बहन और गोविंद की प्रेमिका विद्दा के तौर पर एक
मॉडर्न लड़की का अभिनय किया है। अमित त्रिवेदी का संगीत बेहतरीन है ख़ासकर के
मांजा गाना तो ज़बाँ पर चढ़ जाता है।
दोस्ती
और क्रिकेट हिंदी सिनेमा का हिट फ़ॉर्मुला है, और काइ पो चे में तो ये दोनों ही
चीज़ों मौजूद हैं उपर से कहानी चेतन भगत की है जो फ़िल्म में चार चाँद लगा देती
है। अभिषेक कपूर ने फिर से यह दिखा दिया है कि नये कलाकारों पर भी भरोसा करके
फ़िल्म बनायी जा सकती है।
P.S: रूठे ख़्वाबों को मना लेंगे, कटी पतंगों को थामेंगे, हाँ
हाँ है जज़्बा
सुलझा लेंगे उलझे रिश्तों का
मांझा..मांझा..मांझा ~ lines from the song Manjha
image courtesy ~ india-forums.com