शनिवार, 22 दिसंबर 2012


दिल्ली में चलती बस में एक लड़की से बलात्कार का मामला वहशीपन और दरिंदगी की हद है। इस जघन्य अपराध के लिये फाँसी की सज़ा भी मुझे कम ही लगती है। इस निर्मम घटना के बाद पूरा देश एकजुट होकर उठ खड़ा हुआ है, ताकि दोषियों को कड़ी से कड़ी सज़ा हो और भविष्य में कोई ऐसा कुकृत्य ना करे।
मगर मैं जिस मुद्दे पर बात करना चाहता हूँ वह कुछ और है..बीते तीन से चार दिनों में मैंने देखा कि महिलाओं और लड़कियों के अंदर बहुत ज़्यादा आक्रोश है ख़ासकर पुरुषों के प्रति..हर मर्द उनकी नज़रों से गिर चुका है, पूरे पुरुष वर्ग को वे दोषी समझती हैं, शायद किसी भी पुरुष को देखकर उन्हें वो वहशी-दरिंदे याद आ जाते हैं। जैसे कुछ गंदी मछलियां पूरे तालाब को गंदा कर देती हैं वैसे ही इन दरिंदों ने मर्दों की पूरी ज़ात को बदनाम कर दिया है..जिस किसी भी लड़की की तरफ देखता हूँ लगता है मैं उसका गुनहगार हूँ..ऐसा लगता है जैसे हर लड़की शक़ भरी निगाहों से मुझे देख रही और पूछ रही है कि कैसे यकीन करें तुमपर तुम भी तो उन्हीं की तरह हो नाम और चेहरा अलग है तो क्या हुआ ज़ात तो वही है ना..आज ही रास्ते में कुछ लड़कियों को बात करते सुना “please lets not talk about boys all are same”  यह सुनकर मन में एक टीस उठी कि इन दरिंदों के कुकृत्य के कारण महिलाओं का मर्दों पर से भरोसा ही उठ गया है..मज़ाक में ही सही मगर मेरी ही दो महिला मित्रों ने ये कह ही दिया कि तुम मर्दों पर कौन भरोसा करेगा ना जाने कब क्या कर दो..ये फब्ती भले ही मज़ाक में कसी गई हो मगर इसके पीछे सच छुपा है क्योंकि मेरा ऐसा मानना है कि हर मज़ाक के पीछे एक सच छुपा होता है...मगर ये बात भी भुलायी नहीं जा सकती कि लड़की की सबसे पहले मदद करने आये वो तीन लोग भी पुरुष ही थे..
शायद हमें वो इज़्ज़त, वो भरोसा और वो सम्मान पाने में कुछ वक़्त लग जाये पर एक बात तो हमें कभी नहीं भूलनी चाहिये कि चार फल देखकर कोई पूरे बाग पर अपनी राय नहीं बना सकता

P.S.  ये मेरे अपने विचार हैं जो मैंने चार-पाँच दिनों में हुई घटनाओं और देखी गयी परिस्थितियों पर लिखे हैं..मेरा किसी को आहत करने का कोई अंदेशा नहीं है..फिर भी अगर किसी को बुरा लगा हो तो मैं क्षमा चाहता हूँ।

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