खुशी.. देखने में तो मात्र दो अक्षर का यह शब्द बड़ा ही छोटा दिखता है, मगर
इस छोटे से शब्द के पीछे छिपी होती हैं हमारी कई भावनाएं, क्योंकि यही वह शब्द है
जो मेरे, आपके, हम सबके चेहरे पर मुस्कान बिखेर देता है और दिल में राहत और सुकून
पैदा करता है..इस एक शब्द से हमें कितना सुकून मिलता है यह तो शायद शब्दों में
बयाँ कर पाना बड़ा ही मुश्किल होगा पर इस छोटे से शब्द की महिमा ही कुछ ऐसी है कि
चाह कर भी आप अपने जज़्बातों को छुपा नहीं पाते और आपका चेहरा सब कुछ बयाँ कर देता
है.. कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती..चाहे वो खुशी बड़ी हो या छोटी मगर खुशी तो
खुशी ही होती है..हम कुछ पल के लिये ही सही मगर अपनी परेशानियों और दिक्कतों को
भूल जाते हैं और चाहे वो खुशी छोटी हो या बड़ी हम उसका जश्न मनाते हैं.. जितनी
बड़ी ख़ुशी उतना बड़ा जश्न..
खुशी के विपरीत एक दूसरा शब्द होता है दु:ख.. यह भी उतना ही छोटा है मात्र दो अक्षर का और इस शब्द
से भी हमारी भावनाएं जुड़ी होती हैं मगर दु:ख में हम कोई जश्न नहीं मनाते और ना ही हमें राहत या
सुकून मिलता है..मिलता है तो बस एक अकेलापन, हल्की ख़ामोशी और बिखरे हुए जज़्बात,
जिसे हम जितनी जल्दी हो सके भूला देना चाहते हैं....मगर सवाल यह है कि खुशी और दु:ख दोनों क्या हैं ? मेरा ऐसा मानना है कि ये दिल और दिमाग का
बनाया हुआ एक ताना-बाना है.. भावनाओं और जज़्बातों का इससे कोई लेना-देना नहीं है...ये
सिर्फ पसंद और नापसंद के बीच का खेल है, यानी कि अगर हमारे पसंद की बात हुई तो
ख़ुशी वर्ना दु:ख, तो क्यों ना हम सभी चीज़ों को जिस भी तरह
वो हमें मिल रही हैं अगर पसंद कर लें, क़बूल कर लें तो ग़म की तो गुंजाइश ही खत्म
हो जाएगी..है ना
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