बचपन और हम
कौन भूल सकता है बचपन के वो दिन जब चिंता,
परेशानी, दु:ख, ग़म, तकलीफ जैसे ‘भयावह’ शब्दों का कोई वजूद
नहीं था हमारे जीवन में..जहाँ एक पल में रूठते तो दूसरे ही पल में खुश हो जाते थे..जहाँ
हर दिन अलग सा लगता था और हर दिन कुछ नयी शरारत करने को दिल करता था, जब गुड्डे-गुड़िया
और उनकी शादी कराना ही सबसे दिलचस्प खेल होता था, घर का कूड़ा हो या हो कोई घर का
पुराना टूटा-फूटा सामान हम सब से खेल सकते थे और वो भी खुशी-खुशी बिना किसी झिझक
के..झोपड़ी भी महल हुआ करती थी.. हम अपने जीवन से संतुष्ट रहते थे.. छुआ-छूत,
भेद-भाव, अमीर-ग़रीब, रुपया-पैसा इन चीज़ों का इन सब बातों का कोई महत्व ही नहीं
था..सच और झूठ में कोई फ़र्क ही नहीं पता होता था, जो हम सुनते, जो हमारे बड़े
बताते, हमारे लिये वही सच था, जो हम बोलते वही सच था.. किसी से कोई बैर नहीं किसी
से कोई दुश्मनी नहीं थी..होती थी तो बस कोई छोटी-मोटी लड़ाई जो दर्द खत्म होने के
बाद हम भूल जाते थे..मगर एक बात हमेंशा मन में रहती थी कि जल्दी से बड़े हो जायें,
तब अपने बड़ों को कहते सुना था कि यही दिन अच्छे हैं, जल्दी बड़े होकर क्या करोगे?
बचपन में कभी एक कविता पढ़ी थी जिसकी दो लाइनें याद आ रही हैं (कवि का नाम नहीं याद है
मुझे)-
“चिन्ता रहित खेलना खाना वो फिरना निर्मल
स्वच्छंद,
कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद”
मगर आज हम बड़े हो चुके
हैं, समझदार हो चुके हैं या साफ सीधी भाषा में कहूँ तो ‘मैच्योर्ड’ हो चुके हैं अब हमें
संतोष नहीं होता जो मिल जाये कम ही जान पड़ता है..आज हमें अमीरी ग़रीबी का अंतर
पता है इसलिये हम अमीर होना चाहते हैं, ऊँच-नीच का फर्क पता है..झूठ बोलना हम सीख
गये हैं, भेदभाव के आरोप हम आये दिन लोगों पर लगाते ही रहते हैं और एक बार अगर
किसी से दुश्मनी हो गयी तो उसे भूलते भी नहीं हैं..बेशक़ हम ‘मैच्योर्ड’ तो हो गये हैं पर बचपन
की वो सहजता, सरलता और मासूमियत हम खो चुके हैं, हम ‘प्रैक्टिकल’ होने की चाह में अपने
आप तक को भूलते चले जा रहे हैं और इस क़दर भूल चुके हैं
कि कभी याद भी नहीं आती और जब कभी याद आती है तो झुँझला कर कह उठते हैं “बचपन के
ही दिन अच्छे थे”
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें