सचिन तेंदुलकर
30 दिसम्बर 2012 को भारतीय क्रिकेट टीम पाकिस्तान
के साथ जब अपना पहला एक दिवसीय मैच खेलने चेन्नई के चेपॉक स्टेडियम में उतरी तो उन
ग्यारह नीली जर्सियों के बीच नज़रें दस नंबर की जर्सी पहनने वाले उस छोटे कद के
खिलाड़ी को ढूँढ रही थीं, जो अब कभी भी रंगीन नीली जर्सी में नहीं दिखेगा। जी हाँ
आपने बिल्कुल ठीक पहचाना मैं बात कर रहा हूँ सचिन तेंदुलकर की..
बचपन में जब से थोड़ा होश सम्भाला तब से ही
क्रिकेट देखता आया हूँ क्योंकि क्रिकेट भारत का राष्ट्रीय खेल ना होते हुए भी भारत
का सबसे लोकप्रिय खेल है और यहां बच्चा-बच्चा इस खेल से भलि-भाँति परिचित है। मेरे
पापा को भी यह खेल बहुत ज़्यादा पसंद था इसलिये जिस दिन भी भारत का कोई क्रिकेट
मैच होता तो हम एक साथ बैठ कर मैच देखते । मगर बचपन से लेकर आजतक क्रिकेट में मेरे
लिये अगर कोई एक चीज़ समान थी तो वह थे सचिन तेंदुलकर। मेरे लिये तो क्रिकेट का
मतलब ही थे सचिन तेंदुलकर। खेल चाहे एक दिवसीय हो या पाँच दिवसीय नज़र और दिमाग़
सिर्फ़ सचिन को ढूँढते थे। उस छोटे कद के खिलाड़ी से बड़ी पारी और लम्बे शॉट्स देखने
की आस लिये हम मैच देखा करते थे। और जब कभी सचिन नब्बे के स्कोर के बीच आउट होते
तो ऐसा लगता मानो हम ज़िन्दगी की दौड़ में आउट हो गए हों.. सचिन के आउट होते ही
मानो ऐसा लगता कि हम मैच ही हार गये। कम से कम मेरे घर में तो हम सभी जब सचिन आउट
हो जाते तब मैच देखना बंद कर देते थे। भारतीय क्रिकेट में सच में एक ऐसा वक़्त आया
था जब सचिन के आउट होते ही पूरी टीम ताश के पत्ते की तरह ढह जाती थी और हम मैच हार
जाते थे। ख़ुद ब्रायन लारा ने भी एक इंटरव्यू में कहा था कि 2003 के वर्ल्ड कप
फाइनल में सचिन के आउट होते ही उन्होंने अपना टी.वी बंद कर दिया था। कौन भूल सकता
है सचिन की दक्षिण अफ़्रिका के ख़िलाफ़ वो 200 रनों की पारी, कौन भूल सकता है सचिन
का वो छक्का जो उन्होंने 2003 के वर्ल्ड कप में शोएब अख़्तर की पहली ही बॉल पर
मारा था। हर क्रिकेट प्रेमी को पता था कि सचिन बैटिंग करते हुए सिर्फ़ एक बार ही
हेलमेट उतारते हैं और वो तब जब वह अपना शतक पूरा कर लेते हैं।
नब्बे के दशक से लेकर आज भी जिस घर में भी जाता
हूँ किसी ना किसी बच्चे का नाम सचिन ज़रूर रखा होता था। कुछ ऐसी दीवानगी थी सचिन
के लिये लोगों के दिलों में। सामने वाली टीम के पसीने छुड़ाने के लिये तो सचिन का
नाम ही काफ़ी था । बकौल शेन वार्न सचिन उन्हें सपने में आकर डराते थे। कुछ ऐसा
ख़ौफ़ हुआ करता था सचिन का गेंदबाज़ों के ऊपर..
मगर अपने जीवन के तेईस साल क्रिकेट को देने के
बाद सचिन ने एक दिवसीय क्रिकेट को अलविदा कह दिया। मगर दुख और मलाल इस बात का रहा
कि जिस तरह वह चुपचाप क्रिकेट में आये उसी तरह
उन्होंने क्रिकेट को अलविदा भी कह दिया। कम से कम एक मौका तो दिया होता अपने
प्रशंसकों को एक आख़िरी बार अपने हीरो को खेलते हुए देखने का..एक मौका तो दिया
होता अपने बल्ले से अभिवादन स्वीकार करने का..अगर बता देते कि यह उनका आख़िरी मैच
है तो हम ख़ुद को दिल और दिमाग़ दोनों से तैयार
कर लेते..अब लोग किसी को प्रोत्साहित करने के लिये शायद ही यह कह पायेंगे “अरे कोई बात नहीं यार
सचिन भी कभी-कभी ज़ीरो पर आउट हो जाता है!”
मैच तो आज भी था और मैच
तो आगे भी होंगे मगर अब शायद मैं और शायद करोड़ों भारतीय क्रिकेट प्रेमी यह सवाल
कभी नहीं पूछ पाएँगे..जो सवाल मैं आज भी पूछते पूछते रह गया – “आज इंडिया का मैच है, सचिन ने कितना बनाया?”
P.S.: Commit all your crimes when Sachin is batting.. They will go unnoticed
because even the Lord is watching.
~ A placard at the Sydney Cricket Ground
