रविवार, 30 दिसंबर 2012

सचिन तेंदुलकर


सचिन तेंदुलकर


30 दिसम्बर 2012 को भारतीय क्रिकेट टीम पाकिस्तान के साथ जब अपना पहला एक दिवसीय मैच खेलने चेन्नई के चेपॉक स्टेडियम में उतरी तो उन ग्यारह नीली जर्सियों के बीच नज़रें दस नंबर की जर्सी पहनने वाले उस छोटे कद के खिलाड़ी को ढूँढ रही थीं, जो अब कभी भी रंगीन नीली जर्सी में नहीं दिखेगा। जी हाँ आपने बिल्कुल ठीक पहचाना मैं बात कर रहा हूँ सचिन तेंदुलकर की..

बचपन में जब से थोड़ा होश सम्भाला तब से ही क्रिकेट देखता आया हूँ क्योंकि क्रिकेट भारत का राष्ट्रीय खेल ना होते हुए भी भारत का सबसे लोकप्रिय खेल है और यहां बच्चा-बच्चा इस खेल से भलि-भाँति परिचित है। मेरे पापा को भी यह खेल बहुत ज़्यादा पसंद था इसलिये जिस दिन भी भारत का कोई क्रिकेट मैच होता तो हम एक साथ बैठ कर मैच देखते । मगर बचपन से लेकर आजतक क्रिकेट में मेरे लिये अगर कोई एक चीज़ समान थी तो वह थे सचिन तेंदुलकर। मेरे लिये तो क्रिकेट का मतलब ही थे सचिन तेंदुलकर। खेल चाहे एक दिवसीय हो या पाँच दिवसीय नज़र और दिमाग़ सिर्फ़ सचिन को ढूँढते थे। उस छोटे कद के खिलाड़ी से बड़ी पारी और लम्बे शॉट्स देखने की आस लिये हम मैच देखा करते थे। और जब कभी सचिन नब्बे के स्कोर के बीच आउट होते तो ऐसा लगता मानो हम ज़िन्दगी की दौड़ में आउट हो गए हों.. सचिन के आउट होते ही मानो ऐसा लगता कि हम मैच ही हार गये। कम से कम मेरे घर में तो हम सभी जब सचिन आउट हो जाते तब मैच देखना बंद कर देते थे। भारतीय क्रिकेट में सच में एक ऐसा वक़्त आया था जब सचिन के आउट होते ही पूरी टीम ताश के पत्ते की तरह ढह जाती थी और हम मैच हार जाते थे। ख़ुद ब्रायन लारा ने भी एक इंटरव्यू में कहा था कि 2003 के वर्ल्ड कप फाइनल में सचिन के आउट होते ही उन्होंने अपना टी.वी बंद कर दिया था। कौन भूल सकता है सचिन की दक्षिण अफ़्रिका के ख़िलाफ़ वो 200 रनों की पारी, कौन भूल सकता है सचिन का वो छक्का जो उन्होंने 2003 के वर्ल्ड कप में शोएब अख़्तर की पहली ही बॉल पर मारा था। हर क्रिकेट प्रेमी को पता था कि सचिन बैटिंग करते हुए सिर्फ़ एक बार ही हेलमेट उतारते हैं और वो तब जब वह अपना शतक पूरा कर लेते हैं।

नब्बे के दशक से लेकर आज भी जिस घर में भी जाता हूँ किसी ना किसी बच्चे का नाम सचिन ज़रूर रखा होता था। कुछ ऐसी दीवानगी थी सचिन के लिये लोगों के दिलों में। सामने वाली टीम के पसीने छुड़ाने के लिये तो सचिन का नाम ही काफ़ी था । बकौल शेन वार्न सचिन उन्हें सपने में आकर डराते थे। कुछ ऐसा ख़ौफ़ हुआ करता था सचिन का गेंदबाज़ों के ऊपर..

मगर अपने जीवन के तेईस साल क्रिकेट को देने के बाद सचिन ने एक दिवसीय क्रिकेट को अलविदा कह दिया। मगर दुख और मलाल इस बात का रहा कि जिस तरह वह चुपचाप क्रिकेट में आये सी तरह उन्होंने क्रिकेट को अलविदा भी कह दिया। कम से कम एक मौका तो दिया होता अपने प्रशंसकों को एक आख़िरी बार अपने हीरो को खेलते हुए देखने का..एक मौका तो दिया होता अपने बल्ले से अभिवादन स्वीकार करने का..अगर बता देते कि यह उनका आख़िरी मैच है तो हम ख़ुद को दिल और दिमाग़ दोनों से तैयार कर लेते..अब लोग किसी को प्रोत्साहित करने के लिये शायद ही यह कह पायेंगे अरे कोई बात नहीं यार सचिन भी कभी-कभी ज़ीरो पर आउट हो जाता है!”

मैच तो आज भी था और मैच तो आगे भी होंगे मगर अब शायद मैं और शायद करोड़ों भारतीय क्रिकेट प्रेमी यह सवाल कभी नहीं पूछ पाएँगे..जो सवाल मैं आज भी पूछते पूछते रह गया – आज इंडिया का मैच है, सचिन ने कितना बनाया?”

P.S.: Commit all your crimes when Sachin is batting.. They will go unnoticed because even the Lord is watching.
A placard at the Sydney Cricket Ground

शनिवार, 29 दिसंबर 2012

राजेश खन्ना - “ज़िन्दगी लम्बी नहीं बड़ी होनी चाहिये बाबूमोशाय”

दास्तान: राजेश खन्ना: जन्मदिन पर विशेष राजेश खन्ना .. यह नाम सुनते ही एक मुस्कराता हुआ चेहरा ज़हन में आ जाता है, वो चेहरा जिसकी एक झलक पाने की ख़ात...

गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

दबंग 2


दबंग 2: सलमान की नयी फ़िल्म उनकी पुरानी दबंग का सिक्वल है पर इसमें भी दबंग जैसा ही मसाला है। एक्शन से भरपूर इस फ़िल्म में रोमांस और कॉमेडी का तड़का भी भरपूर है। चुलबुल पाण्डे अपने चिर परिचित अंदाज़ में गुण्डों को पीटते हैं और फिर अपनी बकैती से दर्शकों को हँसाते भी हैं। फ़िल्म में जो एक बात देखने लायक रही वो था पाण्डे परिवार का पारिवारिक सौहार्द जो कि पिछली दबंग से नदारद था। निर्देशक की कुर्सी सम्भालने के बाद अरबाज़ ने ये एक अच्छी बात फ़िल्म में दिखाई शायद इसकी वजह उनकी ख़ुद की सुखद पारिवारिक ज़िंदगी है। ख़ासकर फ़िल्म का वो सीन जहाँ चुलबुल यह कहते हुए ख़ुश होता है कि सपने में उसने अपने पिता जी को अपने दादा जी से मार खाने से बचा लिया तब प्रजापति पाण्डे (विनोद खन्ना) कहते हैं कि मेरा तो एक ही सपना था कि तू मुझे इज़्ज़त दे और तू अब मुझे सपने में भी इज़्ज़त देने लगा है। पिता-पुत्र के प्रेम को अरबाज़ ने बड़े ही ख़ुबसूरत तरीके से दिखाया है। बाकी सब तो नयी दबंग में बिल्कुल पुरानी दबंग जैसा ही है। छेदी सिंह की तरह इस बार भईया सिंह (प्रकाश राज) का आतंक है । भईया के एक भाई हैं चुन्नी (निकितन धीर जो कि आज कल सलमान की सभी फिल्मों में दिखते हैं)। चुन्नी ने सलमान को फ़ाइट सीनों में कड़ी टक्कर दी है ख़ासकर तब जब दोनों शर्ट उतार कर द्वंद युद्ध करते हैं । नयी दबंग में कोई कन्फ्यूज़ कर देने वाला डॉयलॉग भी नहीं है जो याद रहे या दिमाग़ मे बस जाये। फ़िल्म के गाने कुछ ख़ास असर नहीं छोड़ते हैं जहाँ पिछली दबंग में सारे ही गाने बेहतरीन थे वहीं नयी दबंग में दग़ाबाज़ रे के अलावा और कोई गाना दमदार नहीं है, करीना का आइटम सांग फ़ेविकॉल ठीक-ठाक सा है पर उसमें मुन्नी वाली बात नहीं जिससे ये बदनाम हो सके! सपोर्टिग रोल में दीपक डोबरियाल (गेंडा सिंह) ने भी अच्छा अभिनय किया है । कुल मिलाकर नयी दबंग में कुछ भी नया नहीं है।

P.S. : अक्ल के आने के लिये शक़्ल के बिगड़ने का इंतज़ार क्यों कर रहे थे तुम ~ सलमान ख़ान पंकज त्रिपाठी से 

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

दास्तान: खुशी के भावार्थ मेरी नज़र से

दास्तान:

खुशी.. देखने में तो मात्र दो अक्षर का यह शब्द बड...
: खुशी .. देखने में तो मात्र दो अक्षर का यह शब्द बड़ा ही छोटा दिखता है, मगर इस छोटे से शब्द के पीछे छिपी होती हैं हमारी कई भावनाएं, क्यो...

.हर मर्द उनकी नज़रों से गिर चुका है,

दास्तान:
दिल्ली में चलती बस में एक लड़की से बलात्कार कामाम...
: दिल्ली में चलती बस में एक लड़की से बलात्कार का मामला वहशीपन और दरिंदगी की हद है। इस जघन्य अपराध के लिये फाँसी की सज़ा भी मुझे कम ही लगती ...

दिल्ली में चलती बस में एक लड़की से बलात्कार का मामला वहशीपन और दरिंदगी की हद है। इस जघन्य अपराध के लिये फाँसी की सज़ा भी मुझे कम ही लगती है। इस निर्मम घटना के बाद पूरा देश एकजुट होकर उठ खड़ा हुआ है, ताकि दोषियों को कड़ी से कड़ी सज़ा हो और भविष्य में कोई ऐसा कुकृत्य ना करे।
मगर मैं जिस मुद्दे पर बात करना चाहता हूँ वह कुछ और है..बीते तीन से चार दिनों में मैंने देखा कि महिलाओं और लड़कियों के अंदर बहुत ज़्यादा आक्रोश है ख़ासकर पुरुषों के प्रति..हर मर्द उनकी नज़रों से गिर चुका है, पूरे पुरुष वर्ग को वे दोषी समझती हैं, शायद किसी भी पुरुष को देखकर उन्हें वो वहशी-दरिंदे याद आ जाते हैं। जैसे कुछ गंदी मछलियां पूरे तालाब को गंदा कर देती हैं वैसे ही इन दरिंदों ने मर्दों की पूरी ज़ात को बदनाम कर दिया है..जिस किसी भी लड़की की तरफ देखता हूँ लगता है मैं उसका गुनहगार हूँ..ऐसा लगता है जैसे हर लड़की शक़ भरी निगाहों से मुझे देख रही और पूछ रही है कि कैसे यकीन करें तुमपर तुम भी तो उन्हीं की तरह हो नाम और चेहरा अलग है तो क्या हुआ ज़ात तो वही है ना..आज ही रास्ते में कुछ लड़कियों को बात करते सुना “please lets not talk about boys all are same”  यह सुनकर मन में एक टीस उठी कि इन दरिंदों के कुकृत्य के कारण महिलाओं का मर्दों पर से भरोसा ही उठ गया है..मज़ाक में ही सही मगर मेरी ही दो महिला मित्रों ने ये कह ही दिया कि तुम मर्दों पर कौन भरोसा करेगा ना जाने कब क्या कर दो..ये फब्ती भले ही मज़ाक में कसी गई हो मगर इसके पीछे सच छुपा है क्योंकि मेरा ऐसा मानना है कि हर मज़ाक के पीछे एक सच छुपा होता है...मगर ये बात भी भुलायी नहीं जा सकती कि लड़की की सबसे पहले मदद करने आये वो तीन लोग भी पुरुष ही थे..
शायद हमें वो इज़्ज़त, वो भरोसा और वो सम्मान पाने में कुछ वक़्त लग जाये पर एक बात तो हमें कभी नहीं भूलनी चाहिये कि चार फल देखकर कोई पूरे बाग पर अपनी राय नहीं बना सकता

P.S.  ये मेरे अपने विचार हैं जो मैंने चार-पाँच दिनों में हुई घटनाओं और देखी गयी परिस्थितियों पर लिखे हैं..मेरा किसी को आहत करने का कोई अंदेशा नहीं है..फिर भी अगर किसी को बुरा लगा हो तो मैं क्षमा चाहता हूँ।

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012


बचपन और हम

कौन भूल सकता है बचपन के वो दिन जब चिंता, परेशानी, दु:ख, ग़म, तकलीफ जैसे भयावह शब्दों का कोई वजूद नहीं था हमारे जीवन में..जहाँ एक पल में रूठते तो दूसरे ही पल में खुश हो जाते थे..जहाँ हर दिन अलग सा लगता था और हर दिन कुछ नयी शरारत करने को दिल करता था, जब गुड्डे-गुड़िया और उनकी शादी कराना ही सबसे दिलचस्प खेल होता था, घर का कूड़ा हो या हो कोई घर का पुराना टूटा-फूटा सामान हम सब से खेल सकते थे और वो भी खुशी-खुशी बिना किसी झिझक के..झोपड़ी भी महल हुआ करती थी.. हम अपने जीवन से संतुष्ट रहते थे.. छुआ-छूत, भेद-भाव, अमीर-ग़रीब, रुपया-पैसा इन चीज़ों का इन सब बातों का कोई महत्व ही नहीं था..सच और झूठ में कोई फ़र्क ही नहीं पता होता था, जो हम सुनते, जो हमारे बड़े बताते, हमारे लिये वही सच था, जो हम बोलते वही सच था.. किसी से कोई बैर नहीं किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी..होती थी तो बस कोई छोटी-मोटी लड़ाई जो दर्द खत्म होने के बाद हम भूल जाते थे..मगर एक बात हमेंशा मन में रहती थी कि जल्दी से बड़े हो जायें, तब अपने बड़ों को कहते सुना था कि यही दिन अच्छे हैं, जल्दी बड़े होकर क्या करोगे?
 बचपन में कभी एक कविता पढ़ी थी जिसकी दो लाइनें याद आ रही हैं (कवि का नाम नहीं याद है मुझे)-
चिन्ता रहित खेलना खाना वो फिरना निर्मल स्वच्छंद,
  कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद


मगर आज हम बड़े हो चुके हैं, समझदार हो चुके हैं या साफ सीधी भाषा में कहूँ तो मैच्योर्ड हो चुके हैं अब हमें संतोष नहीं होता जो मिल जाये कम ही जान पड़ता है..आज हमें अमीरी ग़रीबी का अंतर पता है इसलिये हम अमीर होना चाहते हैं, ऊँच-नीच का फर्क पता है..झूठ बोलना हम सीख गये हैं, भेदभाव के आरोप हम आये दिन लोगों पर लगाते ही रहते हैं और एक बार अगर किसी से दुश्मनी हो गयी तो उसे भूलते भी नहीं हैं..बेशक़ हम मैच्योर्ड तो हो गये हैं पर बचपन की वो सहजता, सरलता और मासूमियत हम खो चुके हैं, हम प्रैक्टिकल होने की चाह में अपने आप तक को भूलते चले जा रहे हैं और इस क़दर भूल चुके हैं कि कभी याद भी नहीं आती और जब कभी याद आती है तो झुँझला कर कह उठते हैं “बचपन के ही दिन अच्छे थे

गुरुवार, 20 दिसंबर 2012



खुशी.. देखने में तो मात्र दो अक्षर का यह शब्द बड़ा ही छोटा दिखता है, मगर इस छोटे से शब्द के पीछे छिपी होती हैं हमारी कई भावनाएं, क्योंकि यही वह शब्द है जो मेरे, आपके, हम सबके चेहरे पर मुस्कान बिखेर देता है और दिल में राहत और सुकून पैदा करता है..इस एक शब्द से हमें कितना सुकून मिलता है यह तो शायद शब्दों में बयाँ कर पाना बड़ा ही मुश्किल होगा पर इस छोटे से शब्द की महिमा ही कुछ ऐसी है कि चाह कर भी आप अपने जज़्बातों को छुपा नहीं पाते और आपका चेहरा सब कुछ बयाँ कर देता है.. कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती..चाहे वो खुशी बड़ी हो या छोटी मगर खुशी तो खुशी ही होती है..हम कुछ पल के लिये ही सही मगर अपनी परेशानियों और दिक्कतों को भूल जाते हैं और चाहे वो खुशी छोटी हो या बड़ी हम उसका जश्न मनाते हैं.. जितनी बड़ी ख़ुशी उतना बड़ा जश्न..
     खुशी के विपरीत एक दूसरा शब्द होता है दु:ख.. यह भी उतना ही छोटा है मात्र दो अक्षर का और इस शब्द से भी हमारी भावनाएं जुड़ी होती हैं मगर दु:ख में हम कोई जश्न नहीं मनाते और ना ही हमें राहत या सुकून मिलता है..मिलता है तो बस एक अकेलापन, हल्की ख़ामोशी और बिखरे हुए जज़्बात, जिसे हम जितनी जल्दी हो सके भूला देना चाहते हैं....मगर सवाल यह है कि खुशी और दु:ख दोनों क्या हैं मेरा ऐसा मानना है कि ये दिल और दिमाग का बनाया हुआ एक ताना-बाना है.. भावनाओं और जज़्बातों का इससे कोई लेना-देना नहीं है...ये सिर्फ पसंद और नापसंद के बीच का खेल है, यानी कि अगर हमारे पसंद की बात हुई तो ख़ुशी वर्ना दु:ख, तो क्यों ना हम सभी चीज़ों को जिस भी तरह वो हमें मिल रही हैं अगर पसंद कर लें, क़बूल कर लें तो ग़म की तो गुंजाइश ही खत्म हो जाएगी..है ना