सोमवार, 11 मार्च 2013


काइ पो चे: क्रिकेट, दोस्ती और सपनों की उड़ान

क्रिकेट एक विदेशी खेल होते हुए भी हमारे देश भारत में इतना लोकप्रिय है कि यह किसी मज़हब से कम नहीं है। ये एक ऐसा ज़रिया है जो दो अंजान लोगों को भी आपस में जोड़ता है। दोस्ती, प्यार और भाईचारा बढ़ाता है। इस खेल की ख़ुमारी ही कुछ ऐसी है कि लोग भावनाओं में इस क़द्र बह जाते हैं कि जात-पात, ऊँच-नीच, अमीर-ग़रीब कुछ भी नहीं देखते, बस खेल में रम जाते हैं और जीत का जश्न भी पूरे जोश के साथ सब मिलकर मनाते हैं।

      फ़िल्म काइ पो चे भी क्रिकेट, दोस्ती, दोस्तों के सपने और हमारे समाज कि दकियानूसी सोच को दर्शाती है। तीन दोस्त- इशान, गोविंद पटेल और ओमकार शास्त्री उर्फ़ ओमी अपने सपनों को पूरा करने की ख़ातिर जी जान लगा देते हैं, ज़िन्दगी में आगे जाने के लिये कड़ी मेहनत करते हैं। इस काज में उनकी मदद करता है ओमी का स्वार्थी और लालची मामा बिट्टू जोशी। मदद करने के पीछे बिट्टू जोशी की केवल एक मंशा है कि ओमी और उसके पिता जी जो कि इलाके के पुराने मंदिर के मुख्य स्वामी हैं बिट्टू जोशी की पार्टी से जुड़ जाएँ ताकि बिट्टू जोशी का वोट बैंक बढ़ सके। अपने स्वार्थ के लिये बिट्टू जोशी शकुनि मामा का रोल अदा करते हैं। बिट्टू जोशी एक बारगी नहीं सोचते कि एक हँसता खेलता, अपनी दुनिया में मस्त युवा लड़के को मजबूर करना कि वह पार्टी में आकर एक ज़िम्मेदार कार्यकर्ता का हक़ अदा करे।

      क्या गुज़रेगी आप पर जब आपकी आखों के सामने आपका सपना चूर-चूर हो जाये और आप सिवाय ताकने के कुछ और ना कर सकें। कुछ ऐसा ही होता है जब भूकंप के कारण तीनों दोस्तों का मॉल में दुकान खोलने का सपना भी ढह जाता है। देखने और सोचने में यह बड़ा ही मज़ाकिया लगे कि एक तरफ़ तो भूकंप में गोविंद का घर-बार बर्बाद हो गया पर गोविंद घर की चिंता छोड़ मॉल को देखने दौड़ता है जिसमें तीनों ने नयी दुकान बुक कराई है कि कहीं मॉल भी भूकंप की चपेट में ना आ गया हो। उसके दिल में ख़ौफ़ है और उसे अनुमान भी है कि ऐसे बड़े भूकंप में मॉल शायद ही बचे पर वो उसी भूकंप में बचता हुआ अपनी जान पर खेलकर मॉल की अपनी दुकान देखने जाता है क्योंकि यह उसका सपना है। और अपने सपने को हक़ीक़त में बदलने की ख़ातिर आप कुछ भी कर गुज़रने की चाहत रखते हैं, यही गोविंद ने भी किया।

      भूकंप के बाद हुई तबाही में जहाँ हर किसी को जाति और मज़हब भूलकर लोगों कि मदद करनी चाहिये वहाँ इशान जो कि जाति और मज़हब की सोच से परे है, अपनी क्रिकेट अकादमी में खेलने वाले होनहार बच्चे अली और उसके परिवार को बिट्टू जोशी और उसकी पार्टी की ओर से दिये जा रहे सहायता कैंप में मदद के लिये ल कर जाता है पर उन्हें वहाँ से मात्र इसलिये दुत्कार दिया जाता है क्योंकि अली का परिवार मुसलमान है। दलील यह दी जाती है कि कैंप में सिर्फ हिंदू परिवारों को सहायता दी जायेगी क्योंकि ये उनके लोग नहीं है! ये बात दिल को कचोटती है कि हमारे समाज से ये मज़हबी बैर कब ख़त्म होगा। कब हम मज़हबी सोच से ऊपर उठकर इंसानियत को पहचानेंगे और अपनायेंगे, आख़िर कब ? और यह सिलसिला यहीं नहीं रुकता हालात बद से बदतर हो जाते हैं जब गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस की दो बोगियों में आग लगा दी जाती है और इस कुकृत्य से हिंदू भड़क जाते हैं और मुसलमानों के ख़ून के प्यासे हो जाते हैं।

      इशान की क्रिकेट अकादमी का सबसे होनहार बच्चा अली भी कहीं इस दंगे का शिकार ना हो जाये इसलिये इशान उसे बचाने की कोशिश में उसके घर ही रुक जाता है। इशान जो कि अपने देश भारत को अली के रूप में एक होनहार क्रिकेटर देना चाहता है यह नहीं जानता कि मौत उसका इंतज़ार कर रही है। बिट्टू जोशी, ओमी और उनके आदमी अली के घर पर हमला कर देते हैं। ओमी के सिर पर अपने माँ-बाप की ट्रेन में जलकर हुई मौत का बदला लेने की सनक सवार रहती है और वह अली के बाप को गोली मारने की क़वाइद में अपने ही दोस्त इशान को गोली मार देता है....अगर मज़हबी बैर ना होता तो ओमी शायद अपने दोस्त इशान को नहीं खोता।

बावजूद इसके कि ओमी ने इशान की हत्या की है गोविंद ओमी को जेल से निकलने के बाद लेने जाता है और सब कुछ भुला कर उसे अपना लेता है। ऐसे ही होते हैं दोस्त जो आपकी हर ग़लती और बुराई को भूलकर आपको अपनाते हैं। जिनके साथ आप ख़ुद को ख़ुश और महफ़ूज़ पाते हैं।

चेतन भगत के उपन्यास ‘थ्री मिस्टेक्स ऑफ़ माई लाइफ़’ पर बनी फ़िल्म काइ पो चे पूरी तरह से उपन्यास की कहानी को समेटे हुए है। अगर आपने उपन्यास ना भी पढ़ा हो तो आपको लगेगा कि आपने फ़िल्म देखने के बाद उसे पढ़ लिया है। इसका श्रेय स्क्रीनप्ले लेखक पुबाली चौधरी, सुप्रतीक सेन, चेतन भगत और निर्देशक अभिषेक कपूर को जाता है। रॉक ऑन फ़ेम अभिषेक कपूर दोस्ती को इस ख़ूबसूरत तरीके से परदे पर उतारते हैं कि वह देखते ही बनता है। ये लगता ही नहीं कि इशान की भूमिका निभा रहे सुशांत सिंह राजपूत की यह पहली फ़िल्म है। सुशांत ने एक एंगरी यंग मैन का रोल बख़ूबी अदा किया है जो देखने लायक है। सह कलाकार की भूमिका में राजकुमार यादव (गोविंद) अपनी हर फ़िल्म के साथ मँझते जा रहे हैं। अमित साढ ने ओमी का किरदार बख़ूबी निभाया है। फ़िल्म आएशा से अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत करने वाली एक मात्र महिला कलाकार अमृता पूरी ने फ़िल्म में इशान की बहन और गोविंद की प्रेमिका विद्दा के तौर पर एक मॉडर्न लड़की का अभिनय किया है। अमित त्रिवेदी का संगीत बेहतरीन है ख़ासकर के मांजा गाना तो ज़बाँ पर चढ़ जाता है।

दोस्ती और क्रिकेट हिंदी सिनेमा का हिट फ़ॉर्मुला है, और काइ पो चे में तो ये दोनों ही चीज़ों मौजूद हैं उपर से कहानी चेतन भगत की है जो फ़िल्म में चार चाँद लगा देती है। अभिषेक कपूर ने फिर से यह दिखा दिया है कि नये कलाकारों पर भी भरोसा करके फ़िल्म बनायी जा सकती है।

P.S: रूठे ख़्वाबों को मना लेंगे, कटी पतंगों को थामेंगे, हाँ हाँ है जज़्बा
    सुलझा लेंगे उलझे रिश्तों का मांझा..मांझा..मांझा ~ lines from the song Manjha


image courtesy ~ india-forums.com

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013


चेहरा

चेहरा..
दिल में हमेशा रहता है,
दिमाग़ में छाया होता है,
आँखो में बस जाता है
एक चेहरा...
कभी आँखें ढूँढती हैं
बस में आगे की सीट पर,
मेट्रो की भरी भीड़ में,
कॉफ़ी हाउस के कोने में,
क्लास में पिछली बेंच पर
एक चेहरा...
ऑफ़िस में किसी डेस्क पर,
कैण्टीन में इंतज़ार करता,
इंतज़ार करते दूसरी कॉफ़ी पीता,
शादी में कहीं दूर मुस्काता,
सरे राह क़रीब से गुज़रता
एक चेहरा...
ख़ुशी में हँसता हुआ,
और ग़म में कहीं महरूम,
रूठ कर बैठा हुआ,
तन्हा और अकेला
एक चेहरा...
यादों की गहराई में,
ख़्वाबों की परछाई में,
कहीं किस्से और कहानी में
एक चेहरा...
किसी आवाज़ के पीछे,
आँखों को मीचे,
कभी चाँद जैसा,
तो कभी बादलों के बीच बनता
एक चेहरा...
ये चेहरा ही तो है जो किसी भी व्यक्ति को उसकी पहचान देता है और बिना कुछ बोले भी उसके व्यक्तित्व का आधार होता है...

बुधवार, 16 जनवरी 2013

नयी फ़िल्म: मटरू की बिजली का मंडोला


मटरू की बिजली का मंडोला: फ़िल्म को देखने के बाद मेरा मूड तो ज़रा भी नहीं था इस पर कुछ लिखकर अपना समय व्यर्थ करने का मगर मेरे एक मित्र के कहने पर मैंने सोचा कि कुछ लिखना तो बनता है।

अपनी ज़िन्दगी में हम सब कभी किसी एक किरदार में नहीं रहते..घर में हम किसी किरदार मे होते हैं, दफ़्तर में हम किसी दूसरे किरदार में होते हैं, दोस्तों के साथ हम एक फक्कड़ अंदाज़ में होते हैं, किसी महिला मित्र के साथ हम थोड़े संजीदे किरदार में होते हैं..कहने का मतलब बस इतना है कि अपनी ज़रूरत के अनुसार हम अपने किरदार में होते हैं और उसे बख़ूबी निभाते भी हैं।

विशाल भारद्वाज ने भी अपनी नयी फ़िल्म मटरू की बिजली का मंडोला में यही प्रयोग किया है, और अपने मुख्य किरदारों को दोहरे चरित्र में पेश किया है फिर चाहे वो हैरी (पंकज कपूर) हो जो गुलाबो (देशी शराब) पी कर हरिया के किरदार में समा जाता है या फिर वो हुकम सिंह मटरू (इमरान ख़ान) हो जो गाँव वालों की मदद करने की ख़ातिर माओ सेतुंग बन कर आता है। मटरू और हैरी तो किसी कारणवश माओ और हरिया के किरदारों को पहनते हैं मगर चौधरी देवी (शबाना आज़मी) और उनका बेटा बादल (आर्य बब्बर) अपने स्वार्थ के लिये दोहरा चरित्र अपनाते हैं और अपने फ़ायदे की ख़ातिर किसी भी किरदार में ढलने को तैयार रहते हैं।

फ़िल्म हरियाणा के एक गाँव मंडोला पर आधारित है जहाँ गाँव का एक बहुत ही धनी व्यक्ति हैरी मंडोला (पंकज कपूर) गाँव वालों की ज़मीन हड़प कर उस पर अपनी फ़ैक्ट्री डालना चाहता है और इस ‘नेक काज’ के लिये चौधरी देवी हैरी मंडोला को उकसाती हैं क्योंकि हैरी की बेटी बिजली से उन्होंने अपने बेटे बादल की शादी पहले ही तय कर रखी है। और बिजली से बादल की शादी करा वो हैरी की पूरी जायदाद पर कब्ज़ा करना चाहती हैं। वहीं दूसरी तरफ़ किसानों को हैरी से बचाने की ख़ातिर मटरू जो कि दिल्ली विश्वविद्यालय से लॉ की पढ़ाई करके आया है, माओ सेतुंग बन किसानों की मदद करता है। हैरी की एक ही बेटी है बिजली जिसे वो बेहद प्यार करता है। पर सारा दोष तो उस गुलाबो (शराब) का है जिसे पी कर हैरी बौराकर हरिया बन जाता है। पर आख़िर में हैरी शराब छोड़ चौधरी देवी और उसके बेटे बादल की चाल समझ जाता है और गाँव वालों को उनकी ज़मीन वापस कर देता है।

      लचर कहानी, बेदम स्क्रीनप्ले और गानों की ग़लत टाइमिंग फ़िल्म को बहुत ही ज़्यादा बोरिंग बना देते हैं। ख़ासकर इंटरवल के बाद तो फ़िल्म बहुत धीमी हो जाती है। फ़िल्म में अगर कुछ देखने लायक है तो वो है पंकज कपूर का दमदार अभिनय, विशाल भारद्वाज के लिखे डायलॉग और फ़िल्म का संगीत। पंकज ने हैरी और हरिया के किरदारों को बखूबी अदा किया है। स्क्रीन पर आने के बाद पंकज सभी किरदारों पर भारी पड़ते हैं और अपने अभिनय से दर्शकों का दिल जीत लेते हैं। इमरान ख़ान ने भी हरियाणा के मस्त जाट का रोल निभाया है। पंकज जितनी आसानी से हैरी और हरिया के किरदार में घुस जाते थे वह देखने योग्य था, शायद इसीलिये लोग उनकी अदाकारी का लोहा मानते हैं। अनुष्का शर्मा ने कुछ नया करते हुए एक चुलबुली लड़की का अभिनय फिर से किया है। सह-कलाकार के तौर पर शबाना आज़मी को कई सालों के बाद एक दमदार अभिनय करते देखा।

विशाल भारद्वाज जिन्होंने मक़बूल, ओमकारा, कमीने और इश्क़िया जैसी बेहतरीन फ़िल्में बनाई हैं उनसे ऐसी विफल फ़िल्म की उम्मीद नहीं थी। उम्मीद है कि विशाल अगली बार ये ग़लतियाँ नहीं दोहराएँगे।

P.S. : “जब दिल सांड हो तो हर लड़की भैंस दिखाई देती है” ~ हरिया (पंकज कपूर)

रविवार, 30 दिसंबर 2012

सचिन तेंदुलकर


सचिन तेंदुलकर


30 दिसम्बर 2012 को भारतीय क्रिकेट टीम पाकिस्तान के साथ जब अपना पहला एक दिवसीय मैच खेलने चेन्नई के चेपॉक स्टेडियम में उतरी तो उन ग्यारह नीली जर्सियों के बीच नज़रें दस नंबर की जर्सी पहनने वाले उस छोटे कद के खिलाड़ी को ढूँढ रही थीं, जो अब कभी भी रंगीन नीली जर्सी में नहीं दिखेगा। जी हाँ आपने बिल्कुल ठीक पहचाना मैं बात कर रहा हूँ सचिन तेंदुलकर की..

बचपन में जब से थोड़ा होश सम्भाला तब से ही क्रिकेट देखता आया हूँ क्योंकि क्रिकेट भारत का राष्ट्रीय खेल ना होते हुए भी भारत का सबसे लोकप्रिय खेल है और यहां बच्चा-बच्चा इस खेल से भलि-भाँति परिचित है। मेरे पापा को भी यह खेल बहुत ज़्यादा पसंद था इसलिये जिस दिन भी भारत का कोई क्रिकेट मैच होता तो हम एक साथ बैठ कर मैच देखते । मगर बचपन से लेकर आजतक क्रिकेट में मेरे लिये अगर कोई एक चीज़ समान थी तो वह थे सचिन तेंदुलकर। मेरे लिये तो क्रिकेट का मतलब ही थे सचिन तेंदुलकर। खेल चाहे एक दिवसीय हो या पाँच दिवसीय नज़र और दिमाग़ सिर्फ़ सचिन को ढूँढते थे। उस छोटे कद के खिलाड़ी से बड़ी पारी और लम्बे शॉट्स देखने की आस लिये हम मैच देखा करते थे। और जब कभी सचिन नब्बे के स्कोर के बीच आउट होते तो ऐसा लगता मानो हम ज़िन्दगी की दौड़ में आउट हो गए हों.. सचिन के आउट होते ही मानो ऐसा लगता कि हम मैच ही हार गये। कम से कम मेरे घर में तो हम सभी जब सचिन आउट हो जाते तब मैच देखना बंद कर देते थे। भारतीय क्रिकेट में सच में एक ऐसा वक़्त आया था जब सचिन के आउट होते ही पूरी टीम ताश के पत्ते की तरह ढह जाती थी और हम मैच हार जाते थे। ख़ुद ब्रायन लारा ने भी एक इंटरव्यू में कहा था कि 2003 के वर्ल्ड कप फाइनल में सचिन के आउट होते ही उन्होंने अपना टी.वी बंद कर दिया था। कौन भूल सकता है सचिन की दक्षिण अफ़्रिका के ख़िलाफ़ वो 200 रनों की पारी, कौन भूल सकता है सचिन का वो छक्का जो उन्होंने 2003 के वर्ल्ड कप में शोएब अख़्तर की पहली ही बॉल पर मारा था। हर क्रिकेट प्रेमी को पता था कि सचिन बैटिंग करते हुए सिर्फ़ एक बार ही हेलमेट उतारते हैं और वो तब जब वह अपना शतक पूरा कर लेते हैं।

नब्बे के दशक से लेकर आज भी जिस घर में भी जाता हूँ किसी ना किसी बच्चे का नाम सचिन ज़रूर रखा होता था। कुछ ऐसी दीवानगी थी सचिन के लिये लोगों के दिलों में। सामने वाली टीम के पसीने छुड़ाने के लिये तो सचिन का नाम ही काफ़ी था । बकौल शेन वार्न सचिन उन्हें सपने में आकर डराते थे। कुछ ऐसा ख़ौफ़ हुआ करता था सचिन का गेंदबाज़ों के ऊपर..

मगर अपने जीवन के तेईस साल क्रिकेट को देने के बाद सचिन ने एक दिवसीय क्रिकेट को अलविदा कह दिया। मगर दुख और मलाल इस बात का रहा कि जिस तरह वह चुपचाप क्रिकेट में आये उसी तरह उन्होंने क्रिकेट को अलविदा भी कह दिया। कम से कम एक मौका तो दिया होता अपने प्रशंसकों को एक आख़िरी बार अपने हीरो को खेलते हुए देखने का..एक मौका तो दिया होता अपने बल्ले से अभिवादन स्वीकार करने का..अगर बता देते कि यह उनका आख़िरी मैच है तो हम ख़ुद को दिल और दिमाग़ दोनों से तैयार कर लेते..अब लोग किसी को प्रोत्साहित करने के लिये शायद ही यह कह पायेंगे “अरे कोई बात नहीं यार सचिन भी कभी-कभी ज़ीरो पर आउट हो जाता है!”

मैच तो आज भी था और मैच तो आगे भी होंगे मगर अब शायद मैं और शायद करोड़ों भारतीय क्रिकेट प्रेमी यह सवाल कभी नहीं पूछ पाएँगे..जो सवाल मैं आज भी पूछते पूछते रह गया – “आज इंडिया का मैच है, सचिन ने कितना बनाया?”

P.S.: Commit all your crimes when Sachin is batting.. They will go unnoticed because even the Lord is watching.
~  A placard at the Sydney Cricket Ground

शनिवार, 29 दिसंबर 2012

राजेश खन्ना - “ज़िन्दगी लम्बी नहीं बड़ी होनी चाहिये बाबूमोशाय”

दास्तान: राजेश खन्ना: जन्मदिन पर विशेष राजेश खन्ना .. यह नाम सुनते ही एक मुस्कराता हुआ चेहरा ज़हन में आ जाता है, वो चेहरा जिसकी एक झलक पाने की ख़ात...

गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

दबंग 2


दबंग 2: सलमान की नयी फ़िल्म उनकी पुरानी दबंग का सिक्वल है पर इसमें भी दबंग जैसा ही मसाला है। एक्शन से भरपूर इस फ़िल्म में रोमांस और कॉमेडी का तड़का भी भरपूर है। चुलबुल पाण्डे अपने चिर परिचित अंदाज़ में गुण्डों को पीटते हैं और फिर अपनी बकैती से दर्शकों को हँसाते भी हैं। फ़िल्म में जो एक बात देखने लायक रही वो था पाण्डे परिवार का पारिवारिक सौहार्द जो कि पिछली दबंग से नदारद था। निर्देशक की कुर्सी सम्भालने के बाद अरबाज़ ने ये एक अच्छी बात फ़िल्म में दिखाई शायद इसकी वजह उनकी ख़ुद की सुखद पारिवारिक ज़िंदगी है। ख़ासकर फ़िल्म का वो सीन जहाँ चुलबुल यह कहते हुए ख़ुश होता है कि सपने में उसने अपने पिता जी को अपने दादा जी से मार खाने से बचा लिया तब प्रजापति पाण्डे (विनोद खन्ना) कहते हैं कि “मेरा तो एक ही सपना था कि तू मुझे इज़्ज़त दे और तू अब मुझे सपने में भी इज़्ज़त देने लगा है”। पिता-पुत्र के प्रेम को अरबाज़ ने बड़े ही ख़ुबसूरत तरीके से दिखाया है। बाकी सब तो नयी दबंग में बिल्कुल पुरानी दबंग जैसा ही है। छेदी सिंह की तरह इस बार भईया सिंह (प्रकाश राज) का आतंक है । भईया के एक भाई हैं चुन्नी (निकितन धीर जो कि आज कल सलमान की सभी फिल्मों में दिखते हैं)। चुन्नी ने सलमान को फ़ाइट सीनों में कड़ी टक्कर दी है ख़ासकर तब जब दोनों शर्ट उतार कर द्वंद युद्ध करते हैं । नयी दबंग में कोई ‘कन्फ्यूज़ कर देने वाला’ डॉयलॉग भी नहीं है जो याद रहे या दिमाग़ मे बस जाये। फ़िल्म के गाने कुछ ख़ास असर नहीं छोड़ते हैं जहाँ पिछली दबंग में सारे ही गाने बेहतरीन थे वहीं नयी दबंग में ‘दग़ाबाज़ रे’ के अलावा और कोई गाना दमदार नहीं है, करीना का आइटम सांग ‘फ़ेविकॉल’ ठीक-ठाक सा है पर उसमें ‘मुन्नी’ वाली बात नहीं जिससे ये ‘बदनाम’ हो सके! सपोर्टिग रोल में दीपक डोबरियाल (गेंडा सिंह) ने भी अच्छा अभिनय किया है । कुल मिलाकर नयी दबंग में कुछ भी नया नहीं है।

P.S. : अक्ल के आने के लिये शक़्ल के बिगड़ने का इंतज़ार क्यों कर रहे थे तुम ~ सलमान ख़ान पंकज त्रिपाठी से 

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

दास्तान: खुशी के भावार्थ मेरी नज़र से

दास्तान:

खुशी.. देखने में तो मात्र दो अक्षर का यह शब्द बड...
: खुशी .. देखने में तो मात्र दो अक्षर का यह शब्द बड़ा ही छोटा दिखता है, मगर इस छोटे से शब्द के पीछे छिपी होती हैं हमारी कई भावनाएं, क्यो...