चेहरा..
दिल में हमेशा रहता है,
दिमाग़ में छाया होता है,
आँखो में बस जाता है
एक चेहरा...
कभी आँखें ढूँढती हैं
बस में आगे की सीट पर,
मेट्रो की भरी भीड़ में,
कॉफ़ी हाउस के कोने में,
क्लास में पिछली बेंच पर
एक चेहरा...
ऑफ़िस में किसी डेस्क पर,
कैण्टीन में इंतज़ार करता,
इंतज़ार करते दूसरी कॉफ़ी पीता,
शादी में कहीं दूर मुस्काता,
सरे राह क़रीब से गुज़रता
एक चेहरा...
ख़ुशी में हँसता हुआ,
और ग़म में कहीं महरूम,
रूठ कर बैठा हुआ,
तन्हा और अकेला
एक चेहरा...
यादों की गहराई में,
ख़्वाबों की परछाई में,
कहीं किस्से और कहानी में
एक चेहरा...
किसी आवाज़ के पीछे,
आँखों को मीचे,
कभी चाँद जैसा,
तो कभी बादलों के बीच बनता
एक चेहरा...
ये चेहरा ही तो है जो किसी भी व्यक्ति को उसकी
पहचान देता है और बिना कुछ बोले भी उसके व्यक्तित्व का आधार होता है...

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