सोमवार, 9 मई 2016



जब मैं कलकत्ता में रहता था तब मेरे पड़ोस में एक यादव जी रहते थे। यादव जी का अच्छा ख़ासा ट्रांस्पोर्ट का बिज़नेस था। यादव जी बड़े टिप-टॉप से रहा करते थे। हमेशा जूते, प्रेस किए हुए कपड़े पहनते और गाड़ी से चला करते थे। कुछ दिनों के लिए वे बीमारी की वजह से शहर से बाहर चले गए। मुझे उनसे कोई ख़ास मतलब नहीं था। मगर एक दिन महीनों बाद मैंने उन्हें देखा। पुराने कपड़ों और चप्पल में कमज़ोर से यादव जी को पहचानने में थोड़ी मुश्किल हुई। वे पैदल ही घूमते दिखे। उनकी शान-ओ-शौक़त ख़त्म हो चुकी थी। बाद में पता चला कि जब वे शहर से बाहर गए थे तब उनके अपने भाई ने उनके पूरे साम्राज्य पर क़ब्ज़ा कर लिया, और उन्हें दर-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया। उनके भाई ने धोखे से पावर ऑफ़ अटॉर्नी पर दस्तख़त करवा कर उनका सब कुछ अपने नाम कर लिया था। यादव जी की कहानी सुनते ही मुझे अब्बास-मस्तान निर्देशित 'बाज़ीगर' फ़िल्म याद आ गई। बाज़ीगर में भी कुछ इसी तरह मदन चोपड़ा (दलीप ताहिल) अपने मालिक विश्वनाथ शर्मा (अनंत महादेवन) का विश्वास पात्र बनकर उसके साम्राज्य पर क़ब्ज़ा कर लेता है और बाद में चोपड़ा के ही तर्ज़ पर अजय/विकी (शाहरूख़ ख़ान) उससे सब कुछ वापस हथिया लेता है। बात यह है कि फ़िल्मों का असर हम पर और हमारे समाज पर किस क़दर पड़ता है यह उसकी एक बानगी भर है।
बात अगर फ़िल्म की करें तो जब मैंने फ़िल्म देखी तो विलेन को पहचानना मुश्किल हो रहा था क्योंकि विकी/अजय और मदन चोपड़ा दोनों ही अव्वल दर्जे के कमीने थे। मगर शाहरूख़ ज़्यादा हैवान था क्योंकि उसने 3 मासूमों की निर्मम हत्या की थी। बावजूद इसके मुझे पहली बार कोई विलेन पसंद आया। यह विलेन स्टाइलिश था, रोमैंटिक था, गाना गाता और डांस भी करता था, लड़कियां भी उसपर मरती थीं। वह डायलॉग भी बड़े ठसक से बोलता था। इस विलेन की ख़ुमारी का पता इसी बात से लगाया जा सकता है कि फ़िल्म रिलीज़ होने के बाद बड़े ग्लास वाले चश्मे लोगों की नाक पर चढ़े मिले। भारत में आई-लेन्स का प्रचार और प्रसार भी हुआ। 
अब्बास-मस्तान ने एक बेहतरीन सस्पेंस थ्रिलर बनाई और शाहरूख़ ने अपने बेजोड़ अभिनय का परिचय देते हुए बताया कि उन्हें किंग ख़ान ऐसे ही नहीं कहते। उन्होंने हमें यह भी बताया कि कभी हार नहीं माननी चाहिये क्योंकि कभी-कभी कुछ जीतने के लिए कुछ हारना भी पड़ता है और हार कर जीतने वाले को 'बाज़ीगर' कहते हैं।

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