सोमवार, 9 मई 2016


 
राजेश खन्ना.. यह नाम सुनते ही एक मुस्कराता हुआ चेहरा ज़हन में आ जाता है, वो चेहरा जिसकी एक झलक पाने की ख़ातिर लोग सड़कों पर, सिनेमा घरों के बाहर, घंटों इंतज़ार किया करते थे। आज भी घर की बुज़ुर्ग महिलाओं से राजेश खन्ना का ज़िक्र करने पर उनके दिल की हूक साफ़ दिख जाती है। अगर आपको राजेश खन्ना की दीवानगी के बारे में जानना हो तो कभी घर में दादी, नानी, मां से पूछिए पता चल जाएगा राजेश खन्ना की दास्तां। यह नौबत तब थी जबकि ना तो मीडिया इतना सक्रीय था, ना ही सोशल साइट्स थीं।

राजेश की दिवानगी का आलम कुछ इस क़दर था कि पर्दे पर राजेश खन्ना की पलकें उठती गिरती थीं और इधर लड़कियों के दिल मचल उठते थे। लड़कियों ने उनका नाम अपने शरीर पर गुदवा तक रखा था और उनकी फ़ोटो से शादी भी कर ली थी। लड़कियां उन्हें अपने ख़ून से ख़त लिखकर भेजा करती थीं। बग़ैर पुलिस प्रोटेक्शन के उनका घर से बाहर निकलना नामुमकिन था। यहां तक कि उनकी कार भी नहीं बख़्शी जाती थी, लड़कियों के चूमने से लिप्सटिक के दाग़ पूरी कार पर होते थे।

एक बार बीमारी की वजह से काका को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा तब उस वक़्त के सभी बड़े निर्माताओं ने बीमारी का बहाना बना कर उनके आस-पास का कमरा बुक करा लिया। उनके लिये इतने फूल भेजे जाते थे कि बाद में अस्पताल ने उन्हें लेना भी बंद कर दिया।

उनके घर वाले उन्हें प्यार से काका बुलाते थे। काका का असल नाम जतिन खन्ना था। वह एक गोद ली हुई संतान थे इसलिये घर में सब उन्हें बहुत प्यार और दुलार करते थे। वह एकमात्र युवा कलाकार थे जिसके पास उस ज़माने में फ़ैन्सी स्पोर्ट्स कार हुआ थी और जिसे लेकर वो निर्माता, निर्देशकों के पास काम मांगने जाया करते थे। उन्होंने बाकी सितारों की तरह कभी संघर्ष नहीं किया, उनका जीवन कभी अभाव में नहीं गुज़रा। फ़िल्मफ़ेयर सितारा प्रतियोगिता में 10 हज़ार लोगों के बीच चयन होते ही उन्हें 1967 में जी.पी.सिप्पी की फ़िल्म राज़ में लीड एक्टर का रोल मिल गया। हालांकि आख़िरी ख़त उनकी पहली रिलीज़ हुई फ़िल्म थी, लेकिन उसके पहले ही काका जी.पी.सिप्पी की फ़िल्म राज़ साइन कर चुके थे। 1969 से 1972 तक काका की सारी फ़िल्में हिट रही थीं और वे हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार बन चुके थे। तब भारत में शायद ही किसी ने सुपरस्टार शब्द सुना था, मगर राजेश खन्ना ने सुपरस्टारका मतलब लोगों को बताया। सुपरस्टार क्या होता है यह समझाया। उन्होंने लगातार 15 हिट फ़िल्में दीं जो आज भी एक रिकॉर्ड है। लोग यहां तक कहते थे कि ऊपर आका और नीचे काका। वह रोमैंटिक फ़िल्मों के जैसे आका बन चुके थे।

उनकी फ़िल्मों के गाने आज भी लोग गुनगुनाते हैं। पंचम दा (आर.डी.बर्मन), किशोर कुमार और काका की तिकड़ी ने कई फ़िल्मों में हिट गाने दिये जैसे कटी पतंग, शहज़ादा, अपना देश, मेरे जीवन साथी, आपकी क़सम, अजनबी, नमकहराम, अगर तुम ना होते, अलग अलग और अमर प्रेम। काका की फ़िल्म में कौन सा गाना होगा यह ख़ुद काका तय करते थे। गाने को फ़िल्म में डालने से पहले काका को सुनाया जाता था और अगर वो गाना उन्हें हफ़्ते भर याद रह गया तो फ़िल्म में डाला जाता वर्ना नहीं। किशोर कुमार, राजेश खन्ना की आवाज़ बन चुके थे, अपने गाने की बोल लिखने के लिये आनंद बक्शी उनकी पहली पसंद थे। शर्मिला टैगोर, मुमताज़ उनकी पसंदीदा हीरोईनें थीं, मुमताज़ के साथ उन्होंने आठ से भी ज़्यादा फ़िल्मों में काम किया और उनके साथ उनके अफ़ेयर के चर्चे भी ख़ूब रहे मगर 1973 में डिम्पल कपाड़िया के साथ राजेश खन्ना की शादी ने इन सभी चर्चाओं पर ब्रेक लगा दिया। लेकिन ये शादी ज़्यादा दिन तक नहीं चल सकी और 1984 में दोनों अलग हो गये, लेकिन कभी तलाक़ नहीं दिया। राजेश खन्ना का नाम सबसे ज़्यादा अंजू महेंद्रू के साथ जोड़ा गया, मगर रंगीले मिज़ाज के राजेश इस रिश्ते को भी ज़्यादा दिन नहीं चला सके। अपनी बारात भी राजेश अंजू के घर के सामने से लेकर गए थे।

फ़िल्म अमर प्रेम के एक सीन के मुताबिक़ काका को शर्मिला टैगोर के साथ हावरा ब्रिज के नीचे से अपनी नाव लेकर गुज़रना था, लेकिन डायरेक्टर ने यह सोच कर ये सीन हटा दिया कि अगर लोगों को पता चल गया और ज़्यादा भीड़ इकट्ठा हो गयी तो लोगों को सम्भालना मुश्किल हो जायेगा। इस वजह से कहीं हावड़ा ब्रिज को कोई नुक़सान ना पहुंचे।

राजेश खन्ना ने फ़ैशन का ट्रेन्ड ही बदल दिया था, वह जो पहनते वो फ़ैशन बन जाता। उनके नाम का गुरू कुर्ता बाज़ार में ख़ूब बिका। शर्ट के ऊपर बेल्ट पहनने का फ़ैशन भी राजेश खन्ना ले कर आये। बताया जाता है कि राजेश खन्ना के बढ़ते पेट को छुपाने के लिए ही उनको यह छोटा गुरू कुर्ता पहनाया गया था।

1974 तक राजेश खन्ना ने हिंदी सिनेमा पर राज किया या यूं कहें कि हुक़ूमत की। मगर एंगरी यंग मैन अमिताभ बच्चन के तूफ़ानमें बनी दीवार के आगे काका टिक नहीं पाये, ऐसा लगा मानो काका को ज़ंजीर ने जकड़ लिया हो मगर वह शहज़ादे की तरह कोई अजूबा ना कर सके। इसकी बड़ी वजह काका का एक रोमैंटिक हीरो की इमेज में बँध कर रह जाना रहा। उसी दौर में जेपी आंदोलन भी हुआ जिसके कारण लोगों को सत्ता और नाकाम प्रशासन के प्रति विद्रोह कर के जीतता हुआ हीरो ज़्यादा पसंद आया, जो कि अमिताभ की फ़िल्मों में अधिकतर देखने को मिलता था। देखते ही देखते अमिताभ स्टार बन गये। वहीं दूसरी तरफ़ राजेश खन्ना का नाम लोग भूलने लगे। काका की एक बड़ी परेशानी यह भी थी कि वे सोलो हीरो या मेन लीड बनकर ही फ़िल्म में काम करना चाहते थे। काका का देर से सेट पर पहुंचना, सुबह तक पार्टियां करना भी उनकी ढलान की बड़ी वजह बने। काका अपनी सफलता को संभाल नहीं पाए। हमेशा चाटुकारों से घिरे रहना उन्हें पसंद था, मगर असफलता के दौर में उन्हें अकेलेपन ने भी घेर लिया।

कहते हैं अपने बुरे वक्त में राजेश खन्ना हर समय यह बुदबुदाते रहते थे कि हे ईश्वर मेरा इतना इम्तेहान मत ले कि तुझ पर से मेरा विश्वास ही उठ जाय।वे घंटों छत पर खड़े होकर आसमान को निहारा करते और बार बार यह सवाल दोहराते कि उनके साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है। उन्हें शराब की बुरी लत भी लग चुकी थी, जिसे वो मरते दम तक ना छोड़ सके।

नब्बे के दशक में उन्होंने राजनीति में कदम रखा और 1991 से 1996 तक वे नयी दिल्ली में एम.एल.ए के पद पर रहे। इस दौरान उनसे रोज़ाना हज़ारों लोग मिलने आया करते थे और उनके घर पर मानो जनता दरबार लग जाता था। उसी दौरान उन्होंने फ़िल्मों में फिर हाथ आज़माया और आ अब लौट चलेंजैसी फ़्लॉप फ़िल्मों में काम भी किया।
आज राजेश खन्ना बस एक पुरानी याद बन कर रह गये हैं, एक ऐसी सुनहरी याद जो भूलने से भी भूलायी नहीं जा सकती उनकी फ़िल्में, फ़िल्मों के गाने, उनका बाबू मोशाय बोलने का अंदाज़, उनका अभिनय.. भुलाया नहीं जा सकता। सच में काका को उनके फ़ैंस से कोई नहीं छीन सकता पर बड़ा सवाल यह है कि क्या आज भी उनके फ़ैस के दिल के किसी कोने में उनके लिये कोई जगह है ? क्या आज भी काका के पुराने गानों को देखकर काकी, दादी, नानी के उन गोदनों में टीस उठती होगी ?


P.S : “ज़िन्दगी लम्बी नहीं बड़ी होनी चाहिये बाबूमोशाय” (राजेश खन्ना का डायलॉग फ़िल्म आनंद से)


जब मैं कलकत्ता में रहता था तब मेरे पड़ोस में एक यादव जी रहते थे। यादव जी का अच्छा ख़ासा ट्रांस्पोर्ट का बिज़नेस था। यादव जी बड़े टिप-टॉप से रहा करते थे। हमेशा जूते, प्रेस किए हुए कपड़े पहनते और गाड़ी से चला करते थे। कुछ दिनों के लिए वे बीमारी की वजह से शहर से बाहर चले गए। मुझे उनसे कोई ख़ास मतलब नहीं था। मगर एक दिन महीनों बाद मैंने उन्हें देखा। पुराने कपड़ों और चप्पल में कमज़ोर से यादव जी को पहचानने में थोड़ी मुश्किल हुई। वे पैदल ही घूमते दिखे। उनकी शान-ओ-शौक़त ख़त्म हो चुकी थी। बाद में पता चला कि जब वे शहर से बाहर गए थे तब उनके अपने भाई ने उनके पूरे साम्राज्य पर क़ब्ज़ा कर लिया, और उन्हें दर-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया। उनके भाई ने धोखे से पावर ऑफ़ अटॉर्नी पर दस्तख़त करवा कर उनका सब कुछ अपने नाम कर लिया था। यादव जी की कहानी सुनते ही मुझे अब्बास-मस्तान निर्देशित 'बाज़ीगर' फ़िल्म याद आ गई। बाज़ीगर में भी कुछ इसी तरह मदन चोपड़ा (दलीप ताहिल) अपने मालिक विश्वनाथ शर्मा (अनंत महादेवन) का विश्वास पात्र बनकर उसके साम्राज्य पर क़ब्ज़ा कर लेता है और बाद में चोपड़ा के ही तर्ज़ पर अजय/विकी (शाहरूख़ ख़ान) उससे सब कुछ वापस हथिया लेता है। बात यह है कि फ़िल्मों का असर हम पर और हमारे समाज पर किस क़दर पड़ता है यह उसकी एक बानगी भर है।
बात अगर फ़िल्म की करें तो जब मैंने फ़िल्म देखी तो विलेन को पहचानना मुश्किल हो रहा था क्योंकि विकी/अजय और मदन चोपड़ा दोनों ही अव्वल दर्जे के कमीने थे। मगर शाहरूख़ ज़्यादा हैवान था क्योंकि उसने 3 मासूमों की निर्मम हत्या की थी। बावजूद इसके मुझे पहली बार कोई विलेन पसंद आया। यह विलेन स्टाइलिश था, रोमैंटिक था, गाना गाता और डांस भी करता था, लड़कियां भी उसपर मरती थीं। वह डायलॉग भी बड़े ठसक से बोलता था। इस विलेन की ख़ुमारी का पता इसी बात से लगाया जा सकता है कि फ़िल्म रिलीज़ होने के बाद बड़े ग्लास वाले चश्मे लोगों की नाक पर चढ़े मिले। भारत में आई-लेन्स का प्रचार और प्रसार भी हुआ। 
अब्बास-मस्तान ने एक बेहतरीन सस्पेंस थ्रिलर बनाई और शाहरूख़ ने अपने बेजोड़ अभिनय का परिचय देते हुए बताया कि उन्हें किंग ख़ान ऐसे ही नहीं कहते। उन्होंने हमें यह भी बताया कि कभी हार नहीं माननी चाहिये क्योंकि कभी-कभी कुछ जीतने के लिए कुछ हारना भी पड़ता है और हार कर जीतने वाले को 'बाज़ीगर' कहते हैं।