रंग रसिया
रंग रसिया यानि रंगों से खेलने वाला एक रसिया..एक रसिक..वो रसिक जिसके लिए रंग और उसका कैन्वस ही उसकी प्रेमिका हैं..जिनसे वो प्रेम करता है..और वह भी पूरी शिद्दत के साथ..क्योंकि एक कलाकार के लिए उसकी कला से बढ़कर और कुछ भी नहीं..वो उसकी प्रेयसी है, तो उसकी संगिनी भी..वो उसका जीवन है, तो उसकी सांस भी..वो उसकी कल्पना है, तो उसकी प्रेरणा भी..और अगर जो वो दिल है तो उसकी धड़कन भी उसकी कला ही है..एक कलाकार तो मरता है मगर उसकी कला कभी नहीं..
रंग रसिया लेखक रंजीत देसाई की किताब ‘राजा रवि वर्मा’ पर आधारित, एक ऐसे ही कलाकार राजा रवि वर्मा की कहानी है जो एक रंगसाज यानि पेंटर है..रवि वर्मा को ‘राजा’ की पदवी ख़ुद किलीमनूर रियासत के राजा न दी थी, उसके चित्रों से प्रभावित होकर..मगर एक रंगसाज को एक प्रेरणा की ज़रूरत होती है..प्रेरणा जिससे वह प्रेरित होकर अपने कैन्वस पर चित्र उकेर सके, जिससे वह अपनी कल्पना को अपने पेंट ब्रश के ज़रिए चित्रित कर सके..
किलीमनूर (केरल) में जन्मे रवि वर्मा को उसकी प्रेरणा वहां नहीं मिली..वक़्त का पहिया कुछ ऐसा घूमा कि उसे बम्बई आना पड़ा..और यहां उसकी मुलाक़ात हुई सुगंधा से..जो सच में ख़ुशबू बिखेरती थी..सुगंधा की ख़ुशबू से रवि वर्मा के चित्र सुगंधित होने लगे..सुगंधा ने रवि वर्मा के चित्रों को एक नया आयाम दिया, एक नया स्वरूप दिया..जो सच में कल्पना से परे था..रवि वर्मा को सुगंधा में देवी दिखीं तो उसने देवियों के चित्र बनाए..रवि वर्मा को उसमे अप्सरा दिखी तो मेनका और उर्वशी के चित्र बनाए..रवि वर्मा ने फिर मैसूर के राजा के कहने पर चित्र बनाने के लिए पूरा देश घूमा, जिसके बाद रवि को उसकी किरणें मिल गयीं और उसने उपनी रोशनी से भारत ही नहीं पूरे विश्व को दमकाया..
रवि वर्मा ने पहली बार भारतीय कथाओं महाभारत, रामायण को अपने चित्रों के ज़रिए लोगों तक पहुंचाया..रवि वर्मा ने, विरोध के बावजूद देवी-देवताओं के चित्र भी बनाए..और उन्हें मंदिरों से मुक्त कराकर घर-घर तक पहुंचाया..रवि वर्मा ने प्रेम को भी चित्रित किया फिर चाहे वो प्रेम उर्वशी-पुरर्वा का हो, दुष्यंत-शकुंतला का हो और अर्जुन-सुभद्रा का ही क्यों ना हो सबको रवि वर्मा ने अपने कैन्वस पर उतारा..रवि वर्मा ने ऋषि विश्वामित्र के मेनका के प्रति काम प्रेम को भी उकेरा..और यह सब सिर्फ़ अपनी प्रेरणा सुगंधा के कारण..रवि की कल्पना को पंख लग चुके थे और वो उड़ता ही चला गया..
मगर 19वीं सदी के ग़ुलाम भारत को रवि वर्मा की ये कला कहां समझ आने वाली थी..तो उसपर हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करने का इलज़ाम लगा..केस दायर किया गया और रवि वर्मा को जनता और हिंदू पंडितों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा..लेकिन रवि वर्मा को इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ा..और आखिरी दम तक उसने अपने चित्रों में रंग भरे..और रंगों से खेलता रहा..
रंग रसिया देखने के बाद आप रवि वर्मा के चित्रों के बीच, उसकी कलपना के बीच कहीं खो से जाते हैं..इसे निर्देशक केतन मेहता की क़ाबिलियत ही कहेंगे कि उन्होंने इतने ख़ूबसूरत मगर सहज तरीके से इस कहानी को फ़िल्मी परदे पर उतारा..रणदीप हुड्डा तो फ़िल्म दर फ़िल्म अपने अभिनय का लोहा मनवा रहे हैं..फ़िल्म में जब रणदीप, सुगंधा से उर्वशी और पुरर्वा के प्रेम का बखान करते हैं तो वह सीन देखते ही बनता है..सुगंधा बनी नंदना सेन ने भी अपने किरदार को बख़ूबी निभाया है.. वो रवि वर्मा की प्रेरणा भी थीं, चित्रों की मॉडल भी और उनकी प्रेमिका भी..नंदना ने सभी किरदार बोल्ड होते हुए भी बिल्कुल शालीनता और सहजता से पेश किया है..केतन मेहता ने उन्हें फ़िल्म की हीरोइन तभी बनाना तय कर लिया था जब वे नंदना से मिले और उनके घर पर राजा रवि वर्मा की 2 बड़ी पेंटिंगें लगी देखीं..रंग रसिया के टाइटल ट्रैक के अलावा और कोई गाना याद ही नहीं रहा..फ़िल्म की कहानी, स्क्रीनप्ले, निर्दशन और अभिनय हर तरफ़ से परफ़ेक्ट हैं...और यही फ़िल्म की जान हैं...इंटरवल के बाद फ़िल्म थोड़ी सी धीमी हुई मगर फिर से फ़िल्म ने अपना पेस बना लिया..
फ़िल्म देखने के बाद आपको पता चलेगा कि वो रवि वर्मा ही थे जिनके चित्रों की वजह से हिंदू देवी-देवता घर-घर तक पहुंचे..उस वक़्त अछूतों को मंदिर में नहीं घुसने दिया जाता था..मगर रवि वर्मा ने उनतक भी भगवान को पहुंचाया...फ़िल्म देखने के बाद आपको यह भी पता चलेगा की हिंदी सिनेमा में भी राजा रवि वर्मा का कितना बड़ा योगदान रहा है..हिंदी सिनेमा के जनक माने जाने दादा साहब फाल्के को भी मदद करने वाले राजा रवि वर्मा ही थे...
अगर आप कला प्रेमी नहीं हैं और उसे नहीं समझते तो फ़िल्म देखने कतई ना जाएं क्योंकि तब आपको यह फ़िल्म अश्लील और फूहड़ नज़र आएगी..
P.S.- जज (टॉम अल्टर): तुम क़ानून के बारे में क्या जानते हो ?
राजा रवि वर्मा (रणदीप हुड्डा): जितना आप कला के बारे में जानते हैं.
अब मुझे मरने से कोई डर नहीं, तुमने जीते जी ही मुझे ईश्वर के दर्शन करा दिये ~ माधवराव (सचिन खेडकर) राजा रवि वर्मा (रणदीप हुड्डा) से
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