गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

2011 में जब मैं कलकत्ता में था तब विधानसभा चुनाव होने वाले थे..सीपीएम को सत्ता में रहते 34 साल का बहुत ही लंबा वक़्त गुज़र चुका था..जनता एक बदलाव चाहती थी..हर तरफ़, हर कोई एक ही बात करता था और वो ये कि इस बार बदलाव चाहिये..मैंने ख़ुद तृणमुल कांग्रेस को वोट दिया था..इस बदलाव की आंधी ऐसी बही कि 294 सीटों में से 227 सीटें ममता बनर्जी की तृणमुल कांग्रेस को मिली..और ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनीं..कुछ ऐसा ही मैंने दिल्ली के चुनावों में भी देखा जब जनता ने कांग्रेस से त्रस्त होकर आम आदमी पार्टी की ओर रुख किया..और अरविंद केजरीवाल बने दिल्ली के मुख्यमंत्री..
बिल्कुल वैसी ही लहर मुझे इस बार लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी के लिए दिख रही है..जो 2011 में ममता दीदी के लिये पश्चिम बंगाल में और 2013 में अरविंद केजरीवाल के लिए दिल्ली में देखी थी..एक राज्य में एक नेता के लिए लहर बहना कोई बड़ी बात नहीं है..मगर समूचे देश में एक नेता के लिए लहर बहना बहुत बड़ी बात है..आप बस में, ऑटो में या मेट्रो में सफ़र कर रहे हों हर तरफ़ लोग बदलाव की बात कर रहे हैं..वजह चाहे जो हो, नरेंद्र मोदी की चुंबकीय शख़्सियत या कांग्रेस का लंबा और चरमराया शासन..मगर जनता मोदी को ही एक मात्र विकल्प के तौर पर देख रही है..इस बार के लोकसभा चुनावों में बीजेपी अब तक की सबसे बड़ी जीत और कांग्रेस अपनी सबसे बड़ी हार की तरफ़ बढ़ती नज़र आ रही है..